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Monday, April 21, 2008

मेरे पक्षी मित्र


ईश्वर का कुछ ऐसा आशीर्वाद है मुझ पर और मेरे परिवार पर कि पशु-पक्षी हमारे पास आने से नहीं झिझकते.मुझे और मेरी बेटी पुपुल को हर जगह के पशु-पक्षियों में अनूठापन नज़र आ ही जाता है.जिस भी बाज़ार में या गली में हम खरीदारी करने निकलते हैं वहां के सब कुत्ते मेरी बेटी के पीछे पीछे चलने लगते हैं.उसके घुटनों तक चढ कर अठखेलियां करते हैं.अनायास ही पाइड्पाइपर की कहानी दोहराई जाने लगती है,फ़र्क सिर्फ़ इतना ही होता है कि पाइड्पाइपर की कहानी में चूहे होते थे और पुपुल की कहानी में कुत्ते होते हैं. वो बचपन से ही बिना किसी भय के बकरी के छोनों,कुत्ते के पिल्लों, गाय के बछडों को सहलाती,गुदगुदाती रही है. किसी को बिस्किट, किसी को दूध, किसी को पनीर खिला कर बहुत खुश होती है.हां, पक्षियों से उसे इतना लगाव नहीं जितना जानवरों से है.
एक बार हम शिमला में माल रोड पर टहल रहे थे, तभी उसने वहां एक मम्मी कौकर-स्पैनियल और उसके पिल्लों से मित्रता स्थापित कर ली.वो उनके साथ ऐसे रम गई जैसे वो सभी कुत्ते उसी के हों.प्यारे-प्यारे पपी, उस से चिपक गये, मम्मी को कोई ओब्जेक्शन ही नही था.यह दृष्य काफ़ी लोगों के कौतूहल का विषय बन गया.बात जब नये मित्रों से जुदा होने की आयी तो पुपुल ने रो रो कर वो हाल किया कि हमारे भरी सर्दी में पसीने छूट गये.
मुझे पक्षी बहुत पसन्द हैं.मेरी सोसायटी में कोई भी कबूतर या तोता यदि घायल अवस्था में पाया जाता है तो उसे उपचार के लिये मेरे पास ही लाया जाता है.यूं तो हमारे घर पर मछलियां, जमीन वाला कछुआ,एक लैब्रैडोर हमारे साथ रहते हैं.फ़िर भी मुझे मेरी लव-बर्ड्स और तोते मुझे बहुत याद आते हैं.ईश्वर की इच्छा से सभी मुझसे जुदा हो गये.दो-दो पिन्जरे खाली पडे हैं.जब भी कभी मौका मिलेगा, ले आउंगी.अभी बात करते हैं मेरे काक मित्रों की.पिछली गर्मियों में मैने अपनी एक बालकनी में पक्षियों के लिये पानी की व्यवस्था कर दी थी.प्यासे कबूतर,और कितनी ही तरह की चिडियां, वहां आकर अपनी प्यास बुझा कर, शोर मचा कर उड जाते थे.थोडे दिनों के बाद मैने नोटिस किया कि दोपहर के ढाई-तीन बजे रोज़ाना वहां एक कौआ आता है औत पानी पीकर उड जाता है.क्युंकि ये बालकनी मेरे बेडरूम से लगी हुई है, मेरा इन मेहमानों से अच्छा समय बीतने लगा.मैने वहां रोटी और चावल के दाने भी डालने शुरु कर दिये. अब तो पक्षियों के दल तय हो गये अलग अलग वक्त पर. सबसे पहले ११-१२ बजे के बीच कबूतर आ जाते थे,फ़िर नंबर आता काले रंग की पीली चोंच वाली चिडियों का.उनके फ़ुर्र होते ही स्पैरोज़ के जोडे चले आते.अन्त में बारी आती मेरे काक मित्रों की.जब मौसम का मिज़ाज़ ठन्डा होने लगा तो मैने वहां पानी रखना बंद कर दिया किन्तु खाना डालती रही.ना जाने क्यूं मेरे मेहमानों ने आना बंद कर दिया.इस वर्ष जैसे ही ग्रीष्म का आगमन हुआ,मेरे पिछले वर्ष के बिछडे साथी फ़िर से मुझसे आ मिले.अब उनके आने जाने का वही सिलसिला फ़िर से कायम हो गया है.इस साल एक नयी बात देखी.यदि किसी कारण-वश मै खाना पानी दिन के एक बजे तक डालना भूल जाऊं, तो एक बडा सा कौआ चीख चीख कर मुझे याद दिला देता है.जाने वो इतना निडर है, या उसे मेरी दोस्ती इतनी भा गई है कि जब मैं बालकनी में खाना पानी रखने जाती हूं तो वो एक इन्च भी टस से मस नहीं होता. ना ही वो वैली ( हमारी पालतू श्वान) से डरता है.वो बडी शान से रोटी का टुकडा खा कर पानी पीकर, अपने बाकी के मित्रों को आवाज़ लगाता है और उड जाता है. उसके जाने के पश्चात ही बाकी के कौए बालकनी में आकर लंच करते हैं.इतना धैर्य और अनुशासन तो इन्सानों में भी देखने को नहीं मिलता.
दिल्ली जैसे महानगर में मेरे पक्षी मित्रों की रौनक मेरे आशियाने को गुंजायमान रखती है.मुझ जैसी प्रकृति प्रेमी को और क्या चाहिये भला?