Showing posts with label Psittacula cyanocephala. Show all posts
Showing posts with label Psittacula cyanocephala. Show all posts

Tuesday, April 8, 2008

सुन्दरी की बिदाई----

सुन्दरी की बिदाई----

- पंकज अवधिया

रात को सुन्दरी पर लेख लिखने के बाद सुबह पाँच बजे सोया ही था कि मुझे जगाकर बताया गया कि आम के पेड पर तोतो का एक झुण्ड आया है। कैमरा लेकर मै पहुँचा तो लगा जैसे दसो सुन्दरियाँ आम की शाखाओ पर विराजमान है। अचानक मन मे ख्याल आया कि इनसे सुन्दरी को मिलवाया जाये। सुन्दरी को उनके पास लाया गया। आशा के विपरीत जल्दी ही वे आपस मे घुल-मिल गये। सब ने कहा कि लगता है सुन्दरी को अपनाने वाले मिल गये। दिल पर पत्थर रखकर उसे आखिर विदा कर ही दिया। कई घंटो तक वह खुशी-खुशी पेड पर बैठी रही। हमने उसके पंख नही काटे थे और कमरे मे उसे उडने का अभ्यास कराते रहे थे। यही काम आया और कुछ घंटो पहले उसने ऐसी उडान भरी कि पलक झपकते ही नजरो से ओझल हो गयी। सब कुछ जैसे थम सा गया। केवल आँसू ही नही थम रहे-------

Monday, April 7, 2008

एक सुन्दरी मेरे जीवन मे (भाग-पाँच)

एक सुन्दरी मेरे जीवन मे (भाग-पाँच)

- पंकज अवधिया

मनुष्यो का दर्पण से प्रेम तो जग जाहिर है पर पंछियो को भी यह भाता है यह मुझे सुन्दरी के आने के बाद पता चला। सुन्दरी अपने रुप को देखने दर्पण का प्रयोग नही करती ऐसा हमे लगता है। उसे लगता है कि सामने कोई दूसरा पंछी है उसी की नस्ल का। यही कारण है कि शुरु शुरु मे पिंजरे के अन्दर दर्पण रखने पर उसने चोच से उसे मारना शुरु कर दिया। नाराज भी होती रही पर धीरे-धीरे उसे अन्दर वाला पंछी अच्छा लगने लगा। अब वह घंटो मंत्र-मुग्ध सी उसके सामने बैठी रहती है। खाना भी वही खाती है और सोती भी वही है। पहले कुछ घंटो के लिये उसे अकेला छोडने पर वह चिल्लाती थी पर अब इस नये साथी के साथ वह मजे से रह लेती है।

जैसा कि पहले बताया दर्पण के सामने सुन्दरी मंत्र-मुग्ध सी स्थिर खडी रहती है, न बोलती है न ही किसी और की सुध रहती है इसलिये दिन मे कुछ ही घंटे उसके सामने दर्पण रखा जाता है। सुन्दरी से प्रभावित बच्चे जब उसके लिये गिफ्ट लाने की बात कहते है तो मै उन्हे नये किस्म के दर्पण लाने की राय देता हूँ। सुन्दरी को खुश रखने के लिये घर के सदस्य तरह-तरह की सीटी बजाते है और आवाजे निकालते है। बहुत बार तो सुन्दरी कूद कर दर्पण के सामने आ जाती है इस आस मे कि शायद अन्दर वाला आवाज दे रहा है।

सुन्दरी के आने के बाद आस-पास तरह-तरह की मधुर आवाजे निकालने वाले पंछियो की संख्या बढ गयी है। वैसे हमारे बागीचे मे नाना प्रकार के पेड-पौधे लगे है और हम रसायनो का प्रयोग नही करते है इसलिये बडी संख्या मे चिडियो का बसेरा है। सुन्दरी की सुबह इन्ही आवाजो को सुनते होती है। मै रात भर जागता हूँ इसलिये रात के पंछियो से लेकर सुबह चार बजे आवाज करने वाले पंछियो को सुन पाता हूँ। इसके बाद सुन्दरी की ड्यूटी शुरु होती है। बहुत से तोते भी सुन्दरी की आवाज सुनकर आ जाते है। जंगल मे शिकारी पालतू पंछी की मदद से उनके साथियो को पकडते है।

कुछ वर्षो पहले मै रायगढ मे वानस्पतिक सर्वेक्षण कर रहा था। वहाँ लोगो ने डहूक नामक पंछी पिंजरे मे बन्द कर रखा था। वह सुन्दर नही था न ही उसकी आवाज मधुर थी। फिर क्यो इसे पाला है? मैने पूछ ही लिया। उन्होने राज खोला कि इसकी विचित्र आवाज सुनकर इसके साथी आ जाते है और आसानी से पकड लिये जाते है। वे इस पंछी को खाते है। रोज इस तरह इसकी मदद से पंछी पकडे जाते है और खाये जाते है। बडा आश्चर्य लगता है कि कैसे इसके साथी और सजातीय रोज ऐसी बेवकूफी कर बैठते है? कभी तो कोई होशियार पैदा होगा इनके बीच।

चलिये विषय से थोडा भटक ही गये है तो आपको हिरण से जुडा किस्सा भी बताते है। बहुत से वनाँचलो मे हिरण को बचपन से पाल लिया जाता है फिर उसे रोज गुड खिलाया जाता है। बडे होने पर वापस उसे वन मे छोड दिया जाता है। वन मे उसे गुड की याद आती है। वह वापस आता है पर अकेले नही दो-तीन को साथ ले के। ये दो-तीन आते तो है पर वापस नही जा पाते है। पालतू हिरण को गुड मिलता है और फिर उसे वन मे छोड दिया जाता है उसी प्रक्रिया को दोहराने। जब बहुत कम मनुष्य़ थे और बहुत ज्यादा वन्य प्राणी तब तो यह सब बिना किसी पर्यावरणीय असंतुलन के चलता रहता था पर अब मनुष्य़ के यही प्राचीन तरीके उसके लिये अभिशाप बनते जा रहे है। इन वन्य प्राणियो को बचाने की मुहिम मे जुटे लोगो के लिये ऐसी जानकारियाँ महत्वपूर्ण हो सकती है। जंगलो मे जाने से ऐसे राज अक्सर पता चल जाते है। पर इन्हे कहाँ और कैसे बताये यह समझ नही आता। चलिये अब इस लेख के माध्यम से यह सम्भव हुआ।

सुन्दरी के साथियो को चिंतित नही होना चाहिये क्योकि हम उन्हे नही पकडने वाले। इस आस मे कि शायद उसके साथी भी दर्पण से प्रेम करते हो मैने कुछ दर्पण बागीचे मे रखे पर अभी तक तो कुछ रोचक देखने को नही मिला। सुन्दरी के लिये एक खुशखबरी है। एक शीश महल अर्थात दर्पण ही दर्पण से भरे एक विशेष पिंजरे के निर्माण की बात चल रही है। देखिये यह कब सम्भव हो पाता है।

इस लेखमाला के अन्य लेखो को पढने के लिये इस लिंक को क्लिक करे।

[क्षमा करे ये पोस्ट दोबारा शामिल कर रहा हूँ। पहली पोस्ट मे सुधार करते-करते वह डिलिट हो गयी। उसमे दिनेश जी की एक टिप्पणी आयी थी वह भी विलोपित हो गयी। मै उसे डेशबोर्ड मे खोज रहा हूँ। आशा है दिनेश जी क्षमा करेंगे।

आप बताये कि डिलिट पोस्ट को क्या दोबारा प्राप्त किया जा सकता है? यदि हाँ तो कैसे?]

Thursday, April 3, 2008

एक सुन्दरी मेरे जीवन मे (भाग-4)

एक सुन्दरी मेरे जीवन मे (भाग-4)

- पंकज अवधिया

पिंजरे मे जंग न लगे इसलिये इसे प्लास्टिक कोटेड बनाया गया। जब सुन्दरी को इसमे रखा गया तो पहले तो कोई दिक्कत नही हुयी पर बाद मे पिंजरे को ध्यान से देखने के पर पाया कि यह कोटिंग जगह-जगह से उखडी हुयी है। माथा ठनका। रात को उठकर देखा तो पता चला कि सुन्दरी ही उसे कुतर रही है। हमे डर यह था कि कही यह प्लास्टिक अन्दर तो नही जा रहा है। पिताजी ने तुरंत पिंजरा बदलने की बात की। वे बहुत ज्यादा सशंकित थे। सुन्दरी के व्यव्हार और खान-पान मे कुछ फर्क नही दिख रहा था। कुतरा हुआ प्लास्टिक छोटे-छोटे टुकडो के रुप मे नीचे पडा दिखता था। हम लगातार नजर जमाये रहे। कुछ दिनो मे यह स्पष्ट हो गया कि चोच की कसमसाहट को दूर करने या उसे पैना करने के लिये सुन्दरी यह सब करती रही। जबलपुर मे मामा जी के घर करन तोता है। वो दिनभर घर मे खुला घूमता है। जब उसे छोडा जाता है तो सारे जूते-चप्पलो को छुपा दिया जाता है। नही तो कुछ भी कतरे जाने से नही बचता। उन्होने जब इस बारे मे बताया तो सुन्दरी की इस आदत को हमने और अच्छे से जान लिया।

सुन्दरी को मच्छरो से बचाने के लिये गाँव के दर्जी से एक छोटी सी मच्छरदानी सिलवायी गयी। रात को इसे लगाकर खिडकी की ओर कपडा ढक दिया जाता है ताकि उसकी जानी दुश्मन बिल्ली रानी खिडकी पर आकर बैठे भी तो सुन्दरी को डरावने सपने न आये। कुछ ही दिन बीते कि सुन्दरी ने मच्छरदानी और कपडे मे भी बडे-बडे छेद कर दिये। अब जब भी उसे नीन्द नही आती है, इन छेदो से झाँकती रहती है और बिल्ली रानी को चिढाती रहती है। सर्दियो मे कम्बल का भी उसने यही हश्र किया। सब उसे प्यार करते है पर इस हरकत पर नाराज भी हो जाते है। दो बार के प्रयास के बाद अब वही फटी मच्छरदानी उपयोग हो रही है।

आल आउट मे उपस्थित एलीथ्रीन मच्छरो और आदमियो को किस मात्रा मे नुकसान पहुँचाता है यह तो वैज्ञानिक दस्तावेज बतलाते है पर सुन्दरी की प्रजाति के तोतो के पास कितनी देर तक इसे जलाना चाहिये यह जानकारी कही नही मिलती। कम देर तक जलाओ तो मच्छर नही भागते और ज्यादा देर होने पर चिंता होती रहती है। शुरु-शुरु मे सुन्दरी को मच्छर खाते देखा तो लगा कि अब ये शैतान उसके लिये समस्या नही बनेगे पर लगता है कि उसे मच्छर स्वादिष्ट नही लगे। इस प्रजाति के तोते कीडे-मकोडे तो खाते ही है। सुन्दरी का पूरा शरीर ढका होने के कारण मच्छरो से बचा रहता है। पर पंजे खुले होते है। उसी पर मच्छरो की नजर रहती है। रात को सोते समय दूर ही से चट-चट की आवाज सुनायी देती है। एकांतर क्रम मे वो अपने पंजो को हिलाती रहती है चाहे मच्छर हो या न हो। यह प्रक्रिया नीन्द मे भी जारी रहती है। बडी दया आती है। पर करे भी तो क्या? अपनी जडी-बूटी जलाने से वह शोर मचाती है। शायद धुँआ ज्यादा कडवा लगता है उसे।

इस बार मच्छर कुछ ज्यादा ही है। जब भी कोई मच्छर सुन्दरी की ओर आता है तो वो जोर से घुडकने जैसी आवाज निकालती है। शायद यह प्रभावी है क्योकि हमने इससे अक्सर मच्छरो को दूर जाते देखा है।

Monday, March 31, 2008

एक सुन्दरी मेरे जीवन मे (भाग-तीन)

एक सुन्दरी मेरे जीवन मे (भाग-तीन)

- पंकज अवधिया

उपचार के बाद जब सुन्दरी को वापस छोडने की बारी आयी तो हम असमंजस मे पड गये क्योकि हमे नही मालूम था कि वह किन परिस्थितियो मे छत पर गिरी थी। आमतौर पर ये पक्षी झुण्ड मे रहते है और एक बार बिछड जाने के बाद दूसरे झुंड इन्हे नही स्वीकारते है। अंत मे यह निश्चय किया गया कि सुन्दरी को अपने पास ही रखा जाये। हमारे पास एक बडा सा पिंजरा था जिसे पिताजी ने बचपन मे बनवाया था। उस समय हम लोगो ने चुनमुन चिडिया पाली थी। ये चिडिया रात को एक कोने मे सिमट कर बैठ जाती है। एक दिन पिंजरा बाहर छूट गया और बिल्ली ने सब को खा लिया। उसके बाद कभी भी चिडिया न पालने का मन बना लिया था हम लोगो ने। पर सुन्दरी के आगमन ने मन मे उत्साह भर दिया।

यह बडा पिंजरा सुन्दरी को भी खूब भाया। पर इसे सम्भालना मुश्किल था। रोज इसे साफ करना बला लगा। फिर इतने बडे पिंजरे मे सुन्दरी को ठीक से पास से देख भी नही पाते थे। इसलिये इसे थोडे छोटे पिंजरे मे रखने की कोशिश की। पर जब भी ऐसा किया गया सुन्दरी ने विद्रोह कर दिया। सब कुछ छोड के वह पिंजरे को काटने मे जुटी रहती। पास बुलाने पर गुर्राती। जब वापस बडे पिंजरे मे ले जाते तो सामान्य हो जाती। आखिर उसकी ही जीत हुयी।

आपने तो देखा ही होगा तोते को लोग कैसे छोटे से पिंजरे मे रखते है। इतने छोटे कि वह ठीक से घूम भी न सके। फिर उसके पंख भी कतर दिये जाते है। हमने यह निश्चित किया कि कभी पंख नही काटेंगे। आज तक उस निश्चय पर कायम है। कभी-कभी लगता है कि पंख काटने पर उसे हम डायनिंग टेबल पर घुमा सकेंगे। उससे और घनिष्ठ हो सकेंगे पर दूसरे ही पल यह सोच कर दुखी हो जाते है कि कही पंख कतरने से यह नन्हा सा पंछी नाराज न हो जाये। पिंजरे मे सुन्दरी मजे से उडती है। जब वह उडती है तो हम वाह,वाह, हेलीकाप्टर कहते है। शांत बैठी सुन्दरी अब तो हेलीकाप्टर शब्द मुँह से निकलते ही एक जगह पर उडने लगती है। काफी प्रफुल्लित होकर। पता नही वह इस शब्द का क्या मायने निकालती है। भविष्य़ मे उससे संवाद कायम हुआ तो उसे बतायेंगे कि हेलीकाप्टर क्या है? दिखायेंगे भी।

Wednesday, March 26, 2008

एक सुन्दरी मेरे जीवन मे (भाग-दो)

एक सुन्दरी मेरे जीवन मे (भाग-दो)

- पंकज अवधिया

आमतौर पर करण तोते पाले जाते है। वे बडे होते है और पीढियो से उन्हे पाला जा रहा है इसलिये उनकी भोजन सम्बन्धी आवश्यकत्ता की जानकारी आसानी से मिल जाती है पर सुन्दरी के मामले मे बडी दिक्कत का सामना करना पडा। सुन्दरी को क्या खिलाया जाये इसकी खोज मे इंटरनेट खंगाल डाला पर ज्यादा जानकारी नही मिली। पहले तो सेव और संतरे खिलाये गये। सेव का गूदा न खाकर उसने बीज मे रुचि दिखायी। संतरा उसे अधिक पसन्द नही आया। मिर्च आमतौर पर तोते पसंन्द करते है। मिर्च सुंन्दरी की भी पहली पसंद है। पर बीज अधिक होने चाहिये। दाल-चावल सुन्दरी को अधिक पसन्द नही आता है। बचपन मे चने की दाल को भिगोकर फिर पीसकर उसे खिलाया गया। यह पीसी दाल उसे बहुत पसन्द आती थी। दाल पीसने की आवाज होते ही वह चहकने लगती थी।

भोजन की समस्या उस समय हल हुयी जब गाँव से कुछ लोग आये। सुन्दरी को देखते ही बोले कि ये तो शैतान तोता है। हमारी फसल बर्बाद कर देता है। मक्के मे दाने पडे नही कि इनका आक्रमण शुरु हो जाता है। रात को भी ये फसल पर आक्रमण करते है। हमने उनकी बाकी बाते अनसुनी की और मक्के के नये दूध भरे दाने सुन्दरी को दिये। उसने बडे चाव से इसे खाया। फिर पता चला कि पीपल और बरगद के फलो को फैलाने मे भी इनकी भूमिका है। दोनो ही फल गाँव मे मिल जाते है। तुअर की फली और दाने भी इसे पसन्द आये। दाल-चावल की जगह दूध-चावल दिया गया। फिर अंजीर भी सूची मे शामिल हो गयी। सुन्दरी बहुत कम खाती है और उसे जल्दी-जल्दी भूख लगती है। अकेली है इसलिये नाज-नखरो से पली है। एक बार खाने के बाद जब तक बर्तन न बदलो किसी भी चीज को नही खाती है। हम तो सोचते थे कि मनुष्यो के ही नखरे होते है पर सुन्दरी ने भ्रम दूर कर दिया।

लोगो ने सलाह दी कि तोते को मीठा खिलाने से बाल झड जाते है। पहले तो हम डरे पर बाद मे उसे मिठाईयाँ मिलने लगी। आज ही मै उसके बाल देख रहा था। गर्मी बढ रही है। हम चाहते है कि बाल झडे ताकि उसे कम गर्मी लगे पर बाल साल भर वैसे ही रहते है। ये बाल भले गर्मी के लिहाज से ठीक न हो पर सुन्दरी को मच्छरो से बचाते है। शक्कर सुन्दरी की पसन्दीदा चीजो मे से एक है। किसी भी भोज्य पदार्थ मे ऊपर से शक्कर डालकर उसे दिया जा सकता है। नमक की भी शौकीन है पर नमक कम ही दिया जाता है उसे।

इंटरनेट पर इस प्रजाति के तोतो के विषय मे कम जानकारी को देखते हुये मैने हिम्मत करके एक शोध आलेख लिखा सुन्दरी को नजर मे रखकर और चित्रो के साथ उसे प्रकाशित किया। इसके बाद मुझे इस प्रजाति का विशेषज्ञ माना जाने लगा। इस प्रतिक्रिया ने मुझे प्रेरित किया कि मै जंगलो मे भ्रमण के दौरान इस प्रजाति के तोतो पर नजर रखूँ। कुछ ही समय मे नयी जानकारियाँ मिलने लगी और वैज्ञानिक दस्तावेज तैयार होने लगे। इन जानकारियो से सुन्दरी के पालन-पोषण मे बहुत मदद मिली।

Wednesday, March 19, 2008

एक सुन्दरी मेरे जीवन मे (परिचय)

एक सुन्दरी मेरे जीवन मे (परिचय)

- पंकज अवधिया

एक दिन घर की छत पर हमे कुछ तोते घायल अवस्था मे मिले। उनका उपचार आरम्भ किया तो दो ही बच पाये। बाद मे एक और तोते को हम नही बचा पाये। अब जो बचा वह मेल है कि फीमेल, इसे लेकर असमंजस मे रहे। जानकार लोगो ने बताया कि यदि इसके सिर का रंग बडे होने पर लाल हुआ तो मेल होगा। पर यह तोता इतना प्यार था कि इसका नाम सुन्दरी रख दिया गया। जब सुन्दरी बडी हुयी तो पता चला कि यह तो मेल है। सबने सोचा अब इसे सुन्दरलाल पुकारा जाये पर इससे सुन्दरी दुखी रहने लगी। इसलिये सब कुछ जानते हुये भी हम सब उसे सुन्दरी कहते है। इस लिंक मे जाकर आप सुन्दरी की तस्वीरे देखिये। मेरी लेखमाला इसी के आस-पास घूमेगी।

http://ecoport.org/ep?SearchType=pdb&PdbID=103267

http://ecoport.org/ep?SearchType=pdb&PdbID=103265

http://ecoport.org/ep?SearchType=pdb&Subject=Psittacula+cyanocephala&Author=oudhia&SubjectWild=CO&Thumbnails=Only&CaptionWild=CO&AuthorWild=CO