Wednesday, May 14, 2008

कैरी के खर्राटे


क्या आप जानते है की doggi या अन्य जानवर खर्राटे लेते है. भाई हम तो यही जानते-समझते थे की सिर्फ़ इंसान ही खर्राटे मारते है पर कैरी के खर्राटे सुनकर हमे अपनी ये धारणा बदलनी पड़ी है ।कैरी जब सोते है तो बड़ी ही गहरी नींद मे सोते है और ऐसी ही गहरी नींद मे वो खर्राटे भी लेता है और आवाजें भी निकलता है। शुरू मे तो हम लोग समझ ही नही पाये की कैरी राम भी खर्राटे ले सकते है। boxer के लिए कहा जाता है की ये पीठ के बल भी सोते हैजैसा की इस फोटो मे दिख रहा है

काफ़ी शुरू की बात है जब कैरी कुछ महीने का ही था । एक दिन हम सभी ड्राइंग रूम मे बैठे थे और टी.वी.पर न्यूज़ देख रहे थे कैरी भी वहीं carpet पर सो रहा था।।हम सभी टी.वी.पर आ रही न्यूज़ मे लगे थे की बड़े-जोर-जोर से खर्राटे जैसी आवाज आने लगी और जब हम लोगों ने आवाज की और ध्यान किया तो पता चला की ये खर्राटे तो कैरी राम ले रहे थे। यकीन जानिए बाकायदा कैरी की नाक बज रही थी।

कैरी ना केवल खर्राटे लेता है बल्कि सोते हुए सपने मे वो अजीब-अजीब सी आवाजें भी निकलता है।कभी-कूं-कूं तो कभी बड़ी ही अजीब तरह से कुछ जोर-जोर से आवाज निकलता है। कभी-कभी तो हम लोगों को उसे आवाज दे कर उठाना पड़ता है। ऐसा लगता है की उसके दिमाग मे भी कुछ ना कुछ चलता रहता होगा जो उसे सपने मे दिखाई देता है। :)

Friday, May 9, 2008

बुद्धू


आप इस पोस्ट का शीर्षक देख कर अवश्य ही चौंक गये होंगे.बुद्धू हमारे कछुए का नाम है.अब आप कहेंगे ये क्या नाम हुआ भला?इसके मिलने की कहानी भी दिलचस्प है. ५ साल पहले, हम लोग कार के द्वारा उदयपुर से जयपुर जा रहे थे.सितम्बर का महीना था, थोडी थोडी बारिश से मौसम खुशगवार हो गया था. सडक के दोनों ओर हरियाली देख कर चित्त प्रसन्न हो रहा था, शुभा मुदगल का टेप चल रहा था. अचानक पतिदेव ने ब्रेक लगाया और गाडी रोक दी,बोले"देखो सडक के बीचोंबीच कितना सुन्दर पत्थर पडा हुआ है".हम सभी गाडी से उतर कर पास गये तो देखा एक कछुआ घायलवस्था में पडा था.उसकी एक टांग से खून बह रहा था और वो निस्तेज पडा था.हमें पास आते देख उसने अपना सिर और बाकी के तीन पैर अपने खोल में समेट लिये किन्तु घायल पैर बाहर ही रहा.अब हम असमंजस की स्थिति में थे.सारा परिवार पशु प्रेमी है, अत: उसे वहां बेसहारा छोडने का तो सवाल ही नहीं उठता था.शाम ढलने में कुछ ही देर थी, मैने तुरन्त अपना फ़र्स्ट-एड किट निकाला और कछुए की घायल टांग की मरहम -पट्टी कर डाली.अब सवाल उठा इसे अकेला कैसे छोडा जाये, पुपुल की तो आंखों में आंसू छलक आये. मैने पतिदेव की ओर देखा तो उन्होंने मौन स्वीकृति दे दी. हमने उसे उठाया ओर गाडी में सीट के नीचे अखबार बिछा कर विराजमान कर दिया.रास्ते में ही नाम तय हो गया, कि क्यूंकि ये हमें बुधवार को मिला है, इसे हम बुद्धू कह कर बुलायेंगे. इस प्रकार बुद्धू हमारे घर के सदस्य के रूप में शामिल हो गये.दिल्ली पंहुचते ही सबसे पहले वैली (हमारी लैब्रैडोर) ने उसका सूघ-सूंघ कर निरीक्षण किया और बडप्पन दिखाते हुए स्वीकार कर लिया.घर आकर तय किया गया कि जैसे ही ये ठीक हो जाएगा, इसे कहीं जंगल में छोड आयेंगे. बुद्धू ५-७ दिन में ठीक भी हो गया, किन्तु आज तक हम उससे अलग होने की कल्पना से भी विचलित हो जाते हैं.
अब बुद्धू की दिनचर्या सेट करने का भार मुझ पर आ गया. खाने को उसे हम लौकी,कद्दू, खीरा आदि देने लगे.समस्या थी उसके शौच और मूत्र के समय संचालन की.तो मैने इसका हल निकाला.रोज़ाना सुबह ९ बजे मैं उसे पानी के टब में छोडने लगी. २०-२५ मिनट में वो सू-सू और पौटी से फ़्री होने लगा. एक महीने में ही वो इतना समझदार हो गया कि टब से निकलते ही वो सीधा रसोई की ओर बढने लगा क्योंकि वहां उसे भोजन मिलने वाला था.पेट भर खाने के बाद वो रसोई से बाहर आकर पूरे घर का भ्रमण करने लगा.अब उसका रुटीन इतना सेट हो गया है कि अगर हम भूल जायें तो भी वो ९ बजे बाथरूम के पास आकर खडा हो जाता है.दिन के चार बजे उसे जैसे ही रसोई में किसी के आने की आहट होती है, वो रसोई में चला आता है और मेरे या महरी के अंगूठे पर अपना सर मार कर खाना मांगता है.अपना एक हाथ उठा कर हवा में हिला कर , अपना सिर और गर्दन बाहर निकाल कर कलाबाज़ियां दिखाता है.
दिन में वो वैली के पेट से चिपक कर घंटों गु्ज़ार देता है.उन दोनों में इतनी गहरी दोस्ती हो गई है कि वैली को उसकी छेड-छाड से कोई गुरेज़ नही है.वो कभी वैली की पूंछ पर चढता है, कभी उसकी नाक से अपनी नाक अडा देता है.दोनों में एक अनकही अन्डरस्टैन्डिंग हो गई है. उसे ना वैली का खौफ़ है ना हमारा.हां ,आगन्तुकों की आहट मात्र से खोल में सिकुड जाता है.शाम होते ही घर का कोई भी कोना पकड कर वहां छिप जाता है.सर्दियों के मौसम में ना वो खोल से बाहर आता है, ना ही कुछ खाता है.कभी कभी धूप में मैं उसे बालकनी में रख देती हूं तो कुछ एक पत्ते, या खीरे का छोटा सा टुकडा खा लेता है.सारी सर्दियां मैं उसे एक ऊनी टोपी में लपेट कर एक केन की टोकरी में सहेज कर रखती हूं. वसन्त के आगमन के साथ ही उसका भ्रमण शुरु हो जाता है.बरसातों में उसकी गति और चपलता, साथ ही भूख भी बढ जाती है.दिन में ५-६ बार रसोई में आकर खाने की मांग करता है.खास तौर से बरसातों में वो पूरे दिन मेरे पीछे पीछे चक्कर काटता है. ऊपर वाले चित्र में वो अपना वज़न ले रहा है, आखिर फ़िट्नेस का ज़माना है.बाबा रामदेव के बताये रास्ते पर चल कर पूर्ण शाकाहारी भोजन करता है और बहुत ही धीमे धीमे सांस लेता है, यही है उसकी सेहत और लम्बी उम्र का राज़.कैसा लगा आपको हमारा बुद्धू?

Tuesday, April 29, 2008

जब कैरी पहली बार beach पर गया


कैरी को आए कुछ ही दिन हुए थे पर जब से कैरी आया था हम लोगों का घूमना-फिरना बंद हो गया था क्यूंकि कैरी को हर जगह लेकर जा नही सकते थे और घर मे उसे अकेले छोड़ नही सकते थे। एक बार कैरी अकेले घर मे छोड़ कर हम लोग डिनर करने बाहर चले गए थे तो कैरी कमरे की खिड़की से निकल कर बाहर टैरस पर चला गया था और खूब जोर-जोर से भौंक रहा था।और जैसे ही हम लोग गाड़ी से आए की एक पड़ोसी ने हम लोगों को बताया की आपका doggi बहुत देर से भौक रहा था उसे अकेले ऐसे छोड़ कर नही जाना चाहिए। बाद मे पता चला की उन पड़ोसी के पास भी doggi है।

खैर तो ऐसे ही एक सन्डे को हम लोगों ने calangute beach जाने का कार्यक्रम बनाया। और ये तय किया की अबकी कैरी को भी लेकर जायेंगे जिससे उसकी घूमने और गाड़ी मे बैठने की भी आदत पड़ जाए। पर पहली बार बाहर लेकर जाने मे हम लोगों को भी डर लग रहा था कि पता नही वो कैसे बिहेव करेगा। जैसे ही कार चली की कैरी महाशय थोडी देर तो चुप रहे और उसके बाद भौंकना शुरू कर दिया।कैरी थोडी देर चुप रहता और फ़िर कूं-कूं करने लगता। खैर २० मिनट मे beach पर पहुंचे तो वहां लोगों को देख कर कैरी राम घबडा ही गए। और जब कैरी को पानी के पास ले गए तो वो पीछे की तरफ़ भागने लगा। खैर हम सब ने उसे थोडी देर पानी के पास बिठाया और फ़िर कैरी का डर थोड़ा कम हुआ ।

beach पर कुछ लोग तो कैरी को देख कर डर जाते तो वहीं जिन्होंने doggi पाले हुए थे वो कैरी को प्यार करने लगते थे।थोडी देर बाद कैरी को भी मजा आने लगा था। और beach से वापिस लौटने मे कैरी राम इतना थक गए थे कि वो बेटे के पैर पर ही सो गए।

Wednesday, April 23, 2008

रंग बिरंगी मछलियाँ (२)

जैसा की हमने अपनी पिछली पोस्ट मे कहा था की हम इन खूबसूरत और प्यारी मछलियों का विडियो लगायेंगे तो लीजिये हाजिर है विडियो

इन मछलियों को भी जैसे हम लोगों की आवाज और खुशबू पता चल जाती थी क्यूंकि जब हम लोग pond के पास जाते थे तो अक्सर ये लोग पानी मे नीचे की तरफ़ रहती थी या pond मे पड़े पौधों मे छिपी रहती थी पर बुलाने पर बाहर जाती थीऔर पूरे समय इधर-उधर तैरती रहती थी pond मे देखने पर लगता था की थोडी बड़ी हो रही हैऔर इन्हे इस तरह तैरता हुआ देखने मे बहुत अच्छा लगता था अगर एक मछली भी कम दिखती तो लगता था की कहीं मछली मर ना गई हो इसलिए अक्सर हम लोग इनकी गिनती करते रहते थे


ये दोनों विडियो जरा बड़े है


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Monday, April 21, 2008

मेरे पक्षी मित्र


ईश्वर का कुछ ऐसा आशीर्वाद है मुझ पर और मेरे परिवार पर कि पशु-पक्षी हमारे पास आने से नहीं झिझकते.मुझे और मेरी बेटी पुपुल को हर जगह के पशु-पक्षियों में अनूठापन नज़र आ ही जाता है.जिस भी बाज़ार में या गली में हम खरीदारी करने निकलते हैं वहां के सब कुत्ते मेरी बेटी के पीछे पीछे चलने लगते हैं.उसके घुटनों तक चढ कर अठखेलियां करते हैं.अनायास ही पाइड्पाइपर की कहानी दोहराई जाने लगती है,फ़र्क सिर्फ़ इतना ही होता है कि पाइड्पाइपर की कहानी में चूहे होते थे और पुपुल की कहानी में कुत्ते होते हैं. वो बचपन से ही बिना किसी भय के बकरी के छोनों,कुत्ते के पिल्लों, गाय के बछडों को सहलाती,गुदगुदाती रही है. किसी को बिस्किट, किसी को दूध, किसी को पनीर खिला कर बहुत खुश होती है.हां, पक्षियों से उसे इतना लगाव नहीं जितना जानवरों से है.
एक बार हम शिमला में माल रोड पर टहल रहे थे, तभी उसने वहां एक मम्मी कौकर-स्पैनियल और उसके पिल्लों से मित्रता स्थापित कर ली.वो उनके साथ ऐसे रम गई जैसे वो सभी कुत्ते उसी के हों.प्यारे-प्यारे पपी, उस से चिपक गये, मम्मी को कोई ओब्जेक्शन ही नही था.यह दृष्य काफ़ी लोगों के कौतूहल का विषय बन गया.बात जब नये मित्रों से जुदा होने की आयी तो पुपुल ने रो रो कर वो हाल किया कि हमारे भरी सर्दी में पसीने छूट गये.
मुझे पक्षी बहुत पसन्द हैं.मेरी सोसायटी में कोई भी कबूतर या तोता यदि घायल अवस्था में पाया जाता है तो उसे उपचार के लिये मेरे पास ही लाया जाता है.यूं तो हमारे घर पर मछलियां, जमीन वाला कछुआ,एक लैब्रैडोर हमारे साथ रहते हैं.फ़िर भी मुझे मेरी लव-बर्ड्स और तोते मुझे बहुत याद आते हैं.ईश्वर की इच्छा से सभी मुझसे जुदा हो गये.दो-दो पिन्जरे खाली पडे हैं.जब भी कभी मौका मिलेगा, ले आउंगी.अभी बात करते हैं मेरे काक मित्रों की.पिछली गर्मियों में मैने अपनी एक बालकनी में पक्षियों के लिये पानी की व्यवस्था कर दी थी.प्यासे कबूतर,और कितनी ही तरह की चिडियां, वहां आकर अपनी प्यास बुझा कर, शोर मचा कर उड जाते थे.थोडे दिनों के बाद मैने नोटिस किया कि दोपहर के ढाई-तीन बजे रोज़ाना वहां एक कौआ आता है औत पानी पीकर उड जाता है.क्युंकि ये बालकनी मेरे बेडरूम से लगी हुई है, मेरा इन मेहमानों से अच्छा समय बीतने लगा.मैने वहां रोटी और चावल के दाने भी डालने शुरु कर दिये. अब तो पक्षियों के दल तय हो गये अलग अलग वक्त पर. सबसे पहले ११-१२ बजे के बीच कबूतर आ जाते थे,फ़िर नंबर आता काले रंग की पीली चोंच वाली चिडियों का.उनके फ़ुर्र होते ही स्पैरोज़ के जोडे चले आते.अन्त में बारी आती मेरे काक मित्रों की.जब मौसम का मिज़ाज़ ठन्डा होने लगा तो मैने वहां पानी रखना बंद कर दिया किन्तु खाना डालती रही.ना जाने क्यूं मेरे मेहमानों ने आना बंद कर दिया.इस वर्ष जैसे ही ग्रीष्म का आगमन हुआ,मेरे पिछले वर्ष के बिछडे साथी फ़िर से मुझसे आ मिले.अब उनके आने जाने का वही सिलसिला फ़िर से कायम हो गया है.इस साल एक नयी बात देखी.यदि किसी कारण-वश मै खाना पानी दिन के एक बजे तक डालना भूल जाऊं, तो एक बडा सा कौआ चीख चीख कर मुझे याद दिला देता है.जाने वो इतना निडर है, या उसे मेरी दोस्ती इतनी भा गई है कि जब मैं बालकनी में खाना पानी रखने जाती हूं तो वो एक इन्च भी टस से मस नहीं होता. ना ही वो वैली ( हमारी पालतू श्वान) से डरता है.वो बडी शान से रोटी का टुकडा खा कर पानी पीकर, अपने बाकी के मित्रों को आवाज़ लगाता है और उड जाता है. उसके जाने के पश्चात ही बाकी के कौए बालकनी में आकर लंच करते हैं.इतना धैर्य और अनुशासन तो इन्सानों में भी देखने को नहीं मिलता.
दिल्ली जैसे महानगर में मेरे पक्षी मित्रों की रौनक मेरे आशियाने को गुंजायमान रखती है.मुझ जैसी प्रकृति प्रेमी को और क्या चाहिये भला?

Tuesday, April 15, 2008

रंग-बिरंगी मछलियाँ (१)

कैरी को पालने के पहले हमने दिल्ली मे बिल्ली(खरगोश,चिडिया,तोता ,मछली,छोटा वाला कछुआ पाला था ) और अंडमान मे भी मछलियाँ पाली थी तो चलिए आज हम आप लोगों को अपनी अंडमान की मछलियों से मिलवाते है अंडमान मे हमारे घर मे एक pond था अब घर मे खाली pond तो किसी को भी नही भाता इसलिए हम लोगों ने उस pond मे कुछ ornamental fish यानी रंग-बिरंगी मछलियाँ लाकर डाल दी थीअंडमान मे समुन्द्र तो था पर वहां घर के लिए अगर मछलियाँ पालनी हो तो जरा मुश्किल आती थी बस दो या तीन दूकान ही थी जहाँ ऐसी मछली मिलती थी और वो भी बहुत महंगी

खैर जंगली घाट मे एक दूकान थी वहां से हम लोग करीब जोड़े अलग-अलग तरह के लेकर आए थे और उन्हें इस pond मे डाल दिया थामछली खरीदते समय इस बात का ध्यान रक्खा था की शार्क मछली को ना खरीदे क्यूंकि शार्क बाकी गोल्डेन,ब्लैक वगैरा को जल्दी मार देती हैमछलियों को खरीदने के साथ-साथ उनके लिए दाने वगैरा भी खरीदे सुबह उठते ही पहला काम होता था बाहर जाकर pond मे मछलियों को देखना और उन्हें बाहर बुलाना ,उन्हें खाने के लिए दाने डालना और उनसे बात करना इन मछलियों को लाई (मुरमुरा) खाना भी बहुत पसंद थासुबह-सुबह इन्हे देख कर मन खुश हो जाता था(बांयी फोटो मे मछलियाँ गप्पे मारती हुई और दाहिनी फोटो मे मुरमुरा या लाई खाने के लिए आई है। )
वैसे ये समझ जाता है की मछली पालना बहुत ही आसान होता है पर ऐसा भी नही है इन सुन्दर और प्यारी मछलियों को भी देख-भाल की खूब जरुरत होती है पानी साफ होना और दाने ज्यादा ना खा जाएं इस बात का ध्यान रखना होता था क्यूंकि अगर ये दाने ज्यादा खा जाती है तो भी मर जाती है दिल्ली मे जब हम लोग फिश पोंड मे मछलियाँ पालते थे तो अक्सर ऐसा ही होता था

हालांकि ये थी सिर्फ़ बारह ही और एक बहुत ही छोटी सी रोहू भी थीअब वो रोहू थी या नही पता नही पर सब उसे कहते रोहू थे। हर मछली का अपना अलग स्टाइल था काली मछली बहुत ही लेट लतीफ टाइप की थी और ज्यादातर पानी मे नीचे ही रहना पसंद करती थी और ओरंज और ब्लैक बहुत ही तेज थी जैसे ही खाना डालते थे ये दोनों फटाफट जाती थी खाने के लिए और जब तक काली वाली आती थी तब तक खाना ख़त्म हो चुका होता था और हमे दोबारा उनके लिए खाना डालना पड़ता थाएक दिन अचानक सुबह देखा तो काली मछली पानी मे ऊपर गई थी बाद मे पता चला की वो मर गई थीऔर दो दिन के अंदर ही दोनों काली वाली मछलियाँ मर गई थी


जब हम लोग अंडमान से गोवा आने लगे थे तो हमने अपनी इन मछलियों को अपनी एक दोस्त को दे दिया थाऔर इस फोटो मे वो उसके घर के aquarium मे है अपने घर के pond मे तो ये मछलियाँ ज्यादा बड़ी नही लगती थी पर दोस्त के घर के pond मे काफ़ी बड़ी लग रही थी

अगली पोस्ट मे इन प्यारी मछलियों का हम विडियो लगायेंगे

Saturday, April 12, 2008

दुखी कैरी

जानवर इंसानों से ज्यादा भावुक होते है।ये जरुर है की ये बेजुबान बोल तो नही सकते है पर फ़िर भी इनकी आंखों और इनके हाव-भाव से इनके दुखी होने का पता चल ही जाता है। यूं तो कैरी शक्ल से भी थोड़े दुखी राम (पर घर आने वाले दूसरे लोगों को डरावने) लगते है पर आजकल हमारा कैरी भी ऐसे ही दुःख मे है। कल हमारा बड़ा बेटा दिल्ली चला गया और उसके जाने के बाद से ही कैरी बिल्कुल चुप -चुप सा हो गया है। बस हर समय हम लोगों के आस-पास ही बैठा रहता है ।एक अजीब सा सूना पन उसकी आंखों मे दिख रहा है ।

कैरी जो हमारे बेटे को बिल्कुल अपने बराबर समझता है । उससे बिल्कुल बराबरी से खेलना ,फ़ुटबॉल के लिए झपटना और यहां तक की कार मे बैठने मे भी पूरी सीट पर कैरी अपना ही कब्जा चाहते है।

जब भी कोई कहीं जाने के लिए अटैची या बैग निकालता है तो कैरी समझ जाते है की कोई घर से बाहर जा रहा है । और कैरी सामान के आस-पास मंडराने लगते है। और एक दिन पहले से कैरी की आँखें एहसास हो गया था की बेटा कहीं जाने वाला है क्यूंकि जब परसों बेटा पैकिंग कर रहा था तो कैरी को एहसास हो गया था की वो बाहर जाने वाला है।

सुबह जब एअरपोर्ट जाने के लिए निकले तो कैरी ने एक बड़ी ही दुःख भरी नजर से बेटे को देखा । बेटे ने उसे बिस्कुट दिया तोआम तौर पर जब हम लोग दरवाजा लॉक करने लगते है तो कैरी दरवाजे से बाहर निकलने की कोशिश करता है पर कल वहीं बिस्कुट के पास बैठ गया था। और जब हम और पतिदेव एअरपोर्ट से लौट कर आए तो कैरी की आँखें बेटे को ढूंढ रही थी।

वाकई हम इंसान सोचते है की ये तो जानवर है इन्हे भला किसी के आने या जाने से क्या फर्क पड़ता है। पर ऐसा बिल्कुल नही है। इन्हे भी फर्क पड़ता है