Wednesday, June 11, 2008

यूरो कप फ़ुटबाल और कैरी

अब क्रिकेट ख़त्म हो गया है और यूरो कप फ़ुटबाल शुरू हो गया है।क्रिकेट का तो नही पर हाँ फ़ुटबाल का कुछ नशा हमारे कैरी पर भी नजर आ रहा है।रोज शाम को कैरी के साथ १०-१५ मिनट फ़ुटबाल खेलते है ।कैरी कभी पैर से तो कभी मुंह से फ़ुटबाल खेलता है। वैसे एक बात बता दे कैरी बहुत ही अच्छा डिफेन्स मे खेलता है । :)

जब भी हम लोग उसके साथ खेलते है तो जोर से बॉल को उछालते है(किक करते है) और कैरी उसे पकड़ने के लिए दौड़ता है और अगर हम लोग जरा सा चूक जाते है बॉल पकड़ने मे और बॉल कैरी को मिल जाती है. और जब वो बॉल ले लेता है तो छोड़ता नही है। कभी बॉल को मुंह मे लेकर इधर भागता है तो कभी उधर भागता है।

और तब उसका ध्यान हटा कर बॉल लेनी पड़ती है और अगर किक करने मे जरा देर की नही की कैरी बिल्कुल पास आकर बॉल पर कुछ ऐसे पैर रख देता है । :)

Tuesday, June 3, 2008

बारिश और कैरी


मई मे गोवा मे बहुत गर्मी पड़ने लगती है . एक तो उमस और उस पर से खूब कड़ी धूप पर रविवार शाम से गोवा मे बारिशशुरू हो गयी है और इस बारिश का मजा हम लोगों के साथ-साथ कैरी महाशय ने भी उठाया आख़िर कैरी को भी तो गर्मी से राहत मिली है ना

बारिश शुरू होने के पहले जब बादल गरजते है और बिजली चमकती है तो कैरी डर जाता है और हम लोगों के पास आकर बैठ जाता हैऔर जब बारिश शुरू हो जाती है तो कुछ देर तो उसे कुछ समझ नही आता हैपर थोडी देर बाद वो भी बारिश का आनंद लेने लगता हैऔर कभी-कभी बीच-बीच मे भौंकता भी जाता हैकिसे भौंकता है पता नहीशायद बारिश से बहस करता होगा। :)

Tuesday, May 20, 2008

कैरी डॉक्टर और ब्लैकमेलर

अक्सर ऐसे जीव-जंतु जैसे बिल्ली,doggi जिनका खाना पेड़-पौधे नही होता है पर फ़िर भी कभी-कभी इनको पेड़-पौधे खाते हुए देखा जाता है दिल्ली मे हमारे पास जो बिल्ली थी वो भी अक्सर गार्डन मे जा कर बड़े चाव से घास-फूस खाती थी

वो
कहते है ना की जीव-जंतु अपनी छोटी-मोटी बीमारी का इलाज ख़ुद ही कर लेते है और वो भी बिल्कुल प्राकृतिक तरीके से (नेचुरोपैथी )

और अब कैरी को भी हम देखते है की जब कभी कैरी की तबियत ख़राब होती है तो वो बाहर जाकर ढूंढ -ढूंढ कर कुछ ख़ास तरह की घास-फूस और पत्तियां खाता हैपर अगर हम लोग उसे वही पत्ती तोड़ कर खिलाने लगते है तो वो नही खाता है शायद सोचता हो की कहीं कुछ गड़बड़ पत्ती ना खिला दे :)


पर ऐसा नही है की हमेशा सिर्फ़ अपनी बीमारी के इलाज के लिए ही कैरी पत्ती खाता है अब जैसे इस फोटो मे हम लोग बैडमिन्टन खेल रहे थे तो कैरी को बाँध दिया था क्यूंकि वरना कैरी शैटल कॉक लेकर ही भाग जाता थातो गुस्से मे कैरी ने आव-देखा ना ताव बस दीवार मे उग आई इन पत्तियों को ही खाने लगा और हम लोगों को उसे खोलना पड़ाकैरी को भी ब्लैकमेल करना आता है। :)

Wednesday, May 14, 2008

कैरी के खर्राटे


क्या आप जानते है की doggi या अन्य जानवर खर्राटे लेते है. भाई हम तो यही जानते-समझते थे की सिर्फ़ इंसान ही खर्राटे मारते है पर कैरी के खर्राटे सुनकर हमे अपनी ये धारणा बदलनी पड़ी है ।कैरी जब सोते है तो बड़ी ही गहरी नींद मे सोते है और ऐसी ही गहरी नींद मे वो खर्राटे भी लेता है और आवाजें भी निकलता है। शुरू मे तो हम लोग समझ ही नही पाये की कैरी राम भी खर्राटे ले सकते है। boxer के लिए कहा जाता है की ये पीठ के बल भी सोते हैजैसा की इस फोटो मे दिख रहा है

काफ़ी शुरू की बात है जब कैरी कुछ महीने का ही था । एक दिन हम सभी ड्राइंग रूम मे बैठे थे और टी.वी.पर न्यूज़ देख रहे थे कैरी भी वहीं carpet पर सो रहा था।।हम सभी टी.वी.पर आ रही न्यूज़ मे लगे थे की बड़े-जोर-जोर से खर्राटे जैसी आवाज आने लगी और जब हम लोगों ने आवाज की और ध्यान किया तो पता चला की ये खर्राटे तो कैरी राम ले रहे थे। यकीन जानिए बाकायदा कैरी की नाक बज रही थी।

कैरी ना केवल खर्राटे लेता है बल्कि सोते हुए सपने मे वो अजीब-अजीब सी आवाजें भी निकलता है।कभी-कूं-कूं तो कभी बड़ी ही अजीब तरह से कुछ जोर-जोर से आवाज निकलता है। कभी-कभी तो हम लोगों को उसे आवाज दे कर उठाना पड़ता है। ऐसा लगता है की उसके दिमाग मे भी कुछ ना कुछ चलता रहता होगा जो उसे सपने मे दिखाई देता है। :)

Friday, May 9, 2008

बुद्धू


आप इस पोस्ट का शीर्षक देख कर अवश्य ही चौंक गये होंगे.बुद्धू हमारे कछुए का नाम है.अब आप कहेंगे ये क्या नाम हुआ भला?इसके मिलने की कहानी भी दिलचस्प है. ५ साल पहले, हम लोग कार के द्वारा उदयपुर से जयपुर जा रहे थे.सितम्बर का महीना था, थोडी थोडी बारिश से मौसम खुशगवार हो गया था. सडक के दोनों ओर हरियाली देख कर चित्त प्रसन्न हो रहा था, शुभा मुदगल का टेप चल रहा था. अचानक पतिदेव ने ब्रेक लगाया और गाडी रोक दी,बोले"देखो सडक के बीचोंबीच कितना सुन्दर पत्थर पडा हुआ है".हम सभी गाडी से उतर कर पास गये तो देखा एक कछुआ घायलवस्था में पडा था.उसकी एक टांग से खून बह रहा था और वो निस्तेज पडा था.हमें पास आते देख उसने अपना सिर और बाकी के तीन पैर अपने खोल में समेट लिये किन्तु घायल पैर बाहर ही रहा.अब हम असमंजस की स्थिति में थे.सारा परिवार पशु प्रेमी है, अत: उसे वहां बेसहारा छोडने का तो सवाल ही नहीं उठता था.शाम ढलने में कुछ ही देर थी, मैने तुरन्त अपना फ़र्स्ट-एड किट निकाला और कछुए की घायल टांग की मरहम -पट्टी कर डाली.अब सवाल उठा इसे अकेला कैसे छोडा जाये, पुपुल की तो आंखों में आंसू छलक आये. मैने पतिदेव की ओर देखा तो उन्होंने मौन स्वीकृति दे दी. हमने उसे उठाया ओर गाडी में सीट के नीचे अखबार बिछा कर विराजमान कर दिया.रास्ते में ही नाम तय हो गया, कि क्यूंकि ये हमें बुधवार को मिला है, इसे हम बुद्धू कह कर बुलायेंगे. इस प्रकार बुद्धू हमारे घर के सदस्य के रूप में शामिल हो गये.दिल्ली पंहुचते ही सबसे पहले वैली (हमारी लैब्रैडोर) ने उसका सूघ-सूंघ कर निरीक्षण किया और बडप्पन दिखाते हुए स्वीकार कर लिया.घर आकर तय किया गया कि जैसे ही ये ठीक हो जाएगा, इसे कहीं जंगल में छोड आयेंगे. बुद्धू ५-७ दिन में ठीक भी हो गया, किन्तु आज तक हम उससे अलग होने की कल्पना से भी विचलित हो जाते हैं.
अब बुद्धू की दिनचर्या सेट करने का भार मुझ पर आ गया. खाने को उसे हम लौकी,कद्दू, खीरा आदि देने लगे.समस्या थी उसके शौच और मूत्र के समय संचालन की.तो मैने इसका हल निकाला.रोज़ाना सुबह ९ बजे मैं उसे पानी के टब में छोडने लगी. २०-२५ मिनट में वो सू-सू और पौटी से फ़्री होने लगा. एक महीने में ही वो इतना समझदार हो गया कि टब से निकलते ही वो सीधा रसोई की ओर बढने लगा क्योंकि वहां उसे भोजन मिलने वाला था.पेट भर खाने के बाद वो रसोई से बाहर आकर पूरे घर का भ्रमण करने लगा.अब उसका रुटीन इतना सेट हो गया है कि अगर हम भूल जायें तो भी वो ९ बजे बाथरूम के पास आकर खडा हो जाता है.दिन के चार बजे उसे जैसे ही रसोई में किसी के आने की आहट होती है, वो रसोई में चला आता है और मेरे या महरी के अंगूठे पर अपना सर मार कर खाना मांगता है.अपना एक हाथ उठा कर हवा में हिला कर , अपना सिर और गर्दन बाहर निकाल कर कलाबाज़ियां दिखाता है.
दिन में वो वैली के पेट से चिपक कर घंटों गु्ज़ार देता है.उन दोनों में इतनी गहरी दोस्ती हो गई है कि वैली को उसकी छेड-छाड से कोई गुरेज़ नही है.वो कभी वैली की पूंछ पर चढता है, कभी उसकी नाक से अपनी नाक अडा देता है.दोनों में एक अनकही अन्डरस्टैन्डिंग हो गई है. उसे ना वैली का खौफ़ है ना हमारा.हां ,आगन्तुकों की आहट मात्र से खोल में सिकुड जाता है.शाम होते ही घर का कोई भी कोना पकड कर वहां छिप जाता है.सर्दियों के मौसम में ना वो खोल से बाहर आता है, ना ही कुछ खाता है.कभी कभी धूप में मैं उसे बालकनी में रख देती हूं तो कुछ एक पत्ते, या खीरे का छोटा सा टुकडा खा लेता है.सारी सर्दियां मैं उसे एक ऊनी टोपी में लपेट कर एक केन की टोकरी में सहेज कर रखती हूं. वसन्त के आगमन के साथ ही उसका भ्रमण शुरु हो जाता है.बरसातों में उसकी गति और चपलता, साथ ही भूख भी बढ जाती है.दिन में ५-६ बार रसोई में आकर खाने की मांग करता है.खास तौर से बरसातों में वो पूरे दिन मेरे पीछे पीछे चक्कर काटता है. ऊपर वाले चित्र में वो अपना वज़न ले रहा है, आखिर फ़िट्नेस का ज़माना है.बाबा रामदेव के बताये रास्ते पर चल कर पूर्ण शाकाहारी भोजन करता है और बहुत ही धीमे धीमे सांस लेता है, यही है उसकी सेहत और लम्बी उम्र का राज़.कैसा लगा आपको हमारा बुद्धू?

Tuesday, April 29, 2008

जब कैरी पहली बार beach पर गया


कैरी को आए कुछ ही दिन हुए थे पर जब से कैरी आया था हम लोगों का घूमना-फिरना बंद हो गया था क्यूंकि कैरी को हर जगह लेकर जा नही सकते थे और घर मे उसे अकेले छोड़ नही सकते थे। एक बार कैरी अकेले घर मे छोड़ कर हम लोग डिनर करने बाहर चले गए थे तो कैरी कमरे की खिड़की से निकल कर बाहर टैरस पर चला गया था और खूब जोर-जोर से भौंक रहा था।और जैसे ही हम लोग गाड़ी से आए की एक पड़ोसी ने हम लोगों को बताया की आपका doggi बहुत देर से भौक रहा था उसे अकेले ऐसे छोड़ कर नही जाना चाहिए। बाद मे पता चला की उन पड़ोसी के पास भी doggi है।

खैर तो ऐसे ही एक सन्डे को हम लोगों ने calangute beach जाने का कार्यक्रम बनाया। और ये तय किया की अबकी कैरी को भी लेकर जायेंगे जिससे उसकी घूमने और गाड़ी मे बैठने की भी आदत पड़ जाए। पर पहली बार बाहर लेकर जाने मे हम लोगों को भी डर लग रहा था कि पता नही वो कैसे बिहेव करेगा। जैसे ही कार चली की कैरी महाशय थोडी देर तो चुप रहे और उसके बाद भौंकना शुरू कर दिया।कैरी थोडी देर चुप रहता और फ़िर कूं-कूं करने लगता। खैर २० मिनट मे beach पर पहुंचे तो वहां लोगों को देख कर कैरी राम घबडा ही गए। और जब कैरी को पानी के पास ले गए तो वो पीछे की तरफ़ भागने लगा। खैर हम सब ने उसे थोडी देर पानी के पास बिठाया और फ़िर कैरी का डर थोड़ा कम हुआ ।

beach पर कुछ लोग तो कैरी को देख कर डर जाते तो वहीं जिन्होंने doggi पाले हुए थे वो कैरी को प्यार करने लगते थे।थोडी देर बाद कैरी को भी मजा आने लगा था। और beach से वापिस लौटने मे कैरी राम इतना थक गए थे कि वो बेटे के पैर पर ही सो गए।

Wednesday, April 23, 2008

रंग बिरंगी मछलियाँ (२)

जैसा की हमने अपनी पिछली पोस्ट मे कहा था की हम इन खूबसूरत और प्यारी मछलियों का विडियो लगायेंगे तो लीजिये हाजिर है विडियो

इन मछलियों को भी जैसे हम लोगों की आवाज और खुशबू पता चल जाती थी क्यूंकि जब हम लोग pond के पास जाते थे तो अक्सर ये लोग पानी मे नीचे की तरफ़ रहती थी या pond मे पड़े पौधों मे छिपी रहती थी पर बुलाने पर बाहर जाती थीऔर पूरे समय इधर-उधर तैरती रहती थी pond मे देखने पर लगता था की थोडी बड़ी हो रही हैऔर इन्हे इस तरह तैरता हुआ देखने मे बहुत अच्छा लगता था अगर एक मछली भी कम दिखती तो लगता था की कहीं मछली मर ना गई हो इसलिए अक्सर हम लोग इनकी गिनती करते रहते थे


ये दोनों विडियो जरा बड़े है


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Monday, April 21, 2008

मेरे पक्षी मित्र


ईश्वर का कुछ ऐसा आशीर्वाद है मुझ पर और मेरे परिवार पर कि पशु-पक्षी हमारे पास आने से नहीं झिझकते.मुझे और मेरी बेटी पुपुल को हर जगह के पशु-पक्षियों में अनूठापन नज़र आ ही जाता है.जिस भी बाज़ार में या गली में हम खरीदारी करने निकलते हैं वहां के सब कुत्ते मेरी बेटी के पीछे पीछे चलने लगते हैं.उसके घुटनों तक चढ कर अठखेलियां करते हैं.अनायास ही पाइड्पाइपर की कहानी दोहराई जाने लगती है,फ़र्क सिर्फ़ इतना ही होता है कि पाइड्पाइपर की कहानी में चूहे होते थे और पुपुल की कहानी में कुत्ते होते हैं. वो बचपन से ही बिना किसी भय के बकरी के छोनों,कुत्ते के पिल्लों, गाय के बछडों को सहलाती,गुदगुदाती रही है. किसी को बिस्किट, किसी को दूध, किसी को पनीर खिला कर बहुत खुश होती है.हां, पक्षियों से उसे इतना लगाव नहीं जितना जानवरों से है.
एक बार हम शिमला में माल रोड पर टहल रहे थे, तभी उसने वहां एक मम्मी कौकर-स्पैनियल और उसके पिल्लों से मित्रता स्थापित कर ली.वो उनके साथ ऐसे रम गई जैसे वो सभी कुत्ते उसी के हों.प्यारे-प्यारे पपी, उस से चिपक गये, मम्मी को कोई ओब्जेक्शन ही नही था.यह दृष्य काफ़ी लोगों के कौतूहल का विषय बन गया.बात जब नये मित्रों से जुदा होने की आयी तो पुपुल ने रो रो कर वो हाल किया कि हमारे भरी सर्दी में पसीने छूट गये.
मुझे पक्षी बहुत पसन्द हैं.मेरी सोसायटी में कोई भी कबूतर या तोता यदि घायल अवस्था में पाया जाता है तो उसे उपचार के लिये मेरे पास ही लाया जाता है.यूं तो हमारे घर पर मछलियां, जमीन वाला कछुआ,एक लैब्रैडोर हमारे साथ रहते हैं.फ़िर भी मुझे मेरी लव-बर्ड्स और तोते मुझे बहुत याद आते हैं.ईश्वर की इच्छा से सभी मुझसे जुदा हो गये.दो-दो पिन्जरे खाली पडे हैं.जब भी कभी मौका मिलेगा, ले आउंगी.अभी बात करते हैं मेरे काक मित्रों की.पिछली गर्मियों में मैने अपनी एक बालकनी में पक्षियों के लिये पानी की व्यवस्था कर दी थी.प्यासे कबूतर,और कितनी ही तरह की चिडियां, वहां आकर अपनी प्यास बुझा कर, शोर मचा कर उड जाते थे.थोडे दिनों के बाद मैने नोटिस किया कि दोपहर के ढाई-तीन बजे रोज़ाना वहां एक कौआ आता है औत पानी पीकर उड जाता है.क्युंकि ये बालकनी मेरे बेडरूम से लगी हुई है, मेरा इन मेहमानों से अच्छा समय बीतने लगा.मैने वहां रोटी और चावल के दाने भी डालने शुरु कर दिये. अब तो पक्षियों के दल तय हो गये अलग अलग वक्त पर. सबसे पहले ११-१२ बजे के बीच कबूतर आ जाते थे,फ़िर नंबर आता काले रंग की पीली चोंच वाली चिडियों का.उनके फ़ुर्र होते ही स्पैरोज़ के जोडे चले आते.अन्त में बारी आती मेरे काक मित्रों की.जब मौसम का मिज़ाज़ ठन्डा होने लगा तो मैने वहां पानी रखना बंद कर दिया किन्तु खाना डालती रही.ना जाने क्यूं मेरे मेहमानों ने आना बंद कर दिया.इस वर्ष जैसे ही ग्रीष्म का आगमन हुआ,मेरे पिछले वर्ष के बिछडे साथी फ़िर से मुझसे आ मिले.अब उनके आने जाने का वही सिलसिला फ़िर से कायम हो गया है.इस साल एक नयी बात देखी.यदि किसी कारण-वश मै खाना पानी दिन के एक बजे तक डालना भूल जाऊं, तो एक बडा सा कौआ चीख चीख कर मुझे याद दिला देता है.जाने वो इतना निडर है, या उसे मेरी दोस्ती इतनी भा गई है कि जब मैं बालकनी में खाना पानी रखने जाती हूं तो वो एक इन्च भी टस से मस नहीं होता. ना ही वो वैली ( हमारी पालतू श्वान) से डरता है.वो बडी शान से रोटी का टुकडा खा कर पानी पीकर, अपने बाकी के मित्रों को आवाज़ लगाता है और उड जाता है. उसके जाने के पश्चात ही बाकी के कौए बालकनी में आकर लंच करते हैं.इतना धैर्य और अनुशासन तो इन्सानों में भी देखने को नहीं मिलता.
दिल्ली जैसे महानगर में मेरे पक्षी मित्रों की रौनक मेरे आशियाने को गुंजायमान रखती है.मुझ जैसी प्रकृति प्रेमी को और क्या चाहिये भला?

Tuesday, April 15, 2008

रंग-बिरंगी मछलियाँ (१)

कैरी को पालने के पहले हमने दिल्ली मे बिल्ली(खरगोश,चिडिया,तोता ,मछली,छोटा वाला कछुआ पाला था ) और अंडमान मे भी मछलियाँ पाली थी तो चलिए आज हम आप लोगों को अपनी अंडमान की मछलियों से मिलवाते है अंडमान मे हमारे घर मे एक pond था अब घर मे खाली pond तो किसी को भी नही भाता इसलिए हम लोगों ने उस pond मे कुछ ornamental fish यानी रंग-बिरंगी मछलियाँ लाकर डाल दी थीअंडमान मे समुन्द्र तो था पर वहां घर के लिए अगर मछलियाँ पालनी हो तो जरा मुश्किल आती थी बस दो या तीन दूकान ही थी जहाँ ऐसी मछली मिलती थी और वो भी बहुत महंगी

खैर जंगली घाट मे एक दूकान थी वहां से हम लोग करीब जोड़े अलग-अलग तरह के लेकर आए थे और उन्हें इस pond मे डाल दिया थामछली खरीदते समय इस बात का ध्यान रक्खा था की शार्क मछली को ना खरीदे क्यूंकि शार्क बाकी गोल्डेन,ब्लैक वगैरा को जल्दी मार देती हैमछलियों को खरीदने के साथ-साथ उनके लिए दाने वगैरा भी खरीदे सुबह उठते ही पहला काम होता था बाहर जाकर pond मे मछलियों को देखना और उन्हें बाहर बुलाना ,उन्हें खाने के लिए दाने डालना और उनसे बात करना इन मछलियों को लाई (मुरमुरा) खाना भी बहुत पसंद थासुबह-सुबह इन्हे देख कर मन खुश हो जाता था(बांयी फोटो मे मछलियाँ गप्पे मारती हुई और दाहिनी फोटो मे मुरमुरा या लाई खाने के लिए आई है। )
वैसे ये समझ जाता है की मछली पालना बहुत ही आसान होता है पर ऐसा भी नही है इन सुन्दर और प्यारी मछलियों को भी देख-भाल की खूब जरुरत होती है पानी साफ होना और दाने ज्यादा ना खा जाएं इस बात का ध्यान रखना होता था क्यूंकि अगर ये दाने ज्यादा खा जाती है तो भी मर जाती है दिल्ली मे जब हम लोग फिश पोंड मे मछलियाँ पालते थे तो अक्सर ऐसा ही होता था

हालांकि ये थी सिर्फ़ बारह ही और एक बहुत ही छोटी सी रोहू भी थीअब वो रोहू थी या नही पता नही पर सब उसे कहते रोहू थे। हर मछली का अपना अलग स्टाइल था काली मछली बहुत ही लेट लतीफ टाइप की थी और ज्यादातर पानी मे नीचे ही रहना पसंद करती थी और ओरंज और ब्लैक बहुत ही तेज थी जैसे ही खाना डालते थे ये दोनों फटाफट जाती थी खाने के लिए और जब तक काली वाली आती थी तब तक खाना ख़त्म हो चुका होता था और हमे दोबारा उनके लिए खाना डालना पड़ता थाएक दिन अचानक सुबह देखा तो काली मछली पानी मे ऊपर गई थी बाद मे पता चला की वो मर गई थीऔर दो दिन के अंदर ही दोनों काली वाली मछलियाँ मर गई थी


जब हम लोग अंडमान से गोवा आने लगे थे तो हमने अपनी इन मछलियों को अपनी एक दोस्त को दे दिया थाऔर इस फोटो मे वो उसके घर के aquarium मे है अपने घर के pond मे तो ये मछलियाँ ज्यादा बड़ी नही लगती थी पर दोस्त के घर के pond मे काफ़ी बड़ी लग रही थी

अगली पोस्ट मे इन प्यारी मछलियों का हम विडियो लगायेंगे

Saturday, April 12, 2008

दुखी कैरी

जानवर इंसानों से ज्यादा भावुक होते है।ये जरुर है की ये बेजुबान बोल तो नही सकते है पर फ़िर भी इनकी आंखों और इनके हाव-भाव से इनके दुखी होने का पता चल ही जाता है। यूं तो कैरी शक्ल से भी थोड़े दुखी राम (पर घर आने वाले दूसरे लोगों को डरावने) लगते है पर आजकल हमारा कैरी भी ऐसे ही दुःख मे है। कल हमारा बड़ा बेटा दिल्ली चला गया और उसके जाने के बाद से ही कैरी बिल्कुल चुप -चुप सा हो गया है। बस हर समय हम लोगों के आस-पास ही बैठा रहता है ।एक अजीब सा सूना पन उसकी आंखों मे दिख रहा है ।

कैरी जो हमारे बेटे को बिल्कुल अपने बराबर समझता है । उससे बिल्कुल बराबरी से खेलना ,फ़ुटबॉल के लिए झपटना और यहां तक की कार मे बैठने मे भी पूरी सीट पर कैरी अपना ही कब्जा चाहते है।

जब भी कोई कहीं जाने के लिए अटैची या बैग निकालता है तो कैरी समझ जाते है की कोई घर से बाहर जा रहा है । और कैरी सामान के आस-पास मंडराने लगते है। और एक दिन पहले से कैरी की आँखें एहसास हो गया था की बेटा कहीं जाने वाला है क्यूंकि जब परसों बेटा पैकिंग कर रहा था तो कैरी को एहसास हो गया था की वो बाहर जाने वाला है।

सुबह जब एअरपोर्ट जाने के लिए निकले तो कैरी ने एक बड़ी ही दुःख भरी नजर से बेटे को देखा । बेटे ने उसे बिस्कुट दिया तोआम तौर पर जब हम लोग दरवाजा लॉक करने लगते है तो कैरी दरवाजे से बाहर निकलने की कोशिश करता है पर कल वहीं बिस्कुट के पास बैठ गया था। और जब हम और पतिदेव एअरपोर्ट से लौट कर आए तो कैरी की आँखें बेटे को ढूंढ रही थी।

वाकई हम इंसान सोचते है की ये तो जानवर है इन्हे भला किसी के आने या जाने से क्या फर्क पड़ता है। पर ऐसा बिल्कुल नही है। इन्हे भी फर्क पड़ता है


Tuesday, April 8, 2008

सुन्दरी की बिदाई----

सुन्दरी की बिदाई----

- पंकज अवधिया

रात को सुन्दरी पर लेख लिखने के बाद सुबह पाँच बजे सोया ही था कि मुझे जगाकर बताया गया कि आम के पेड पर तोतो का एक झुण्ड आया है। कैमरा लेकर मै पहुँचा तो लगा जैसे दसो सुन्दरियाँ आम की शाखाओ पर विराजमान है। अचानक मन मे ख्याल आया कि इनसे सुन्दरी को मिलवाया जाये। सुन्दरी को उनके पास लाया गया। आशा के विपरीत जल्दी ही वे आपस मे घुल-मिल गये। सब ने कहा कि लगता है सुन्दरी को अपनाने वाले मिल गये। दिल पर पत्थर रखकर उसे आखिर विदा कर ही दिया। कई घंटो तक वह खुशी-खुशी पेड पर बैठी रही। हमने उसके पंख नही काटे थे और कमरे मे उसे उडने का अभ्यास कराते रहे थे। यही काम आया और कुछ घंटो पहले उसने ऐसी उडान भरी कि पलक झपकते ही नजरो से ओझल हो गयी। सब कुछ जैसे थम सा गया। केवल आँसू ही नही थम रहे-------

Monday, April 7, 2008

एक सुन्दरी मेरे जीवन मे (भाग-पाँच)

एक सुन्दरी मेरे जीवन मे (भाग-पाँच)

- पंकज अवधिया

मनुष्यो का दर्पण से प्रेम तो जग जाहिर है पर पंछियो को भी यह भाता है यह मुझे सुन्दरी के आने के बाद पता चला। सुन्दरी अपने रुप को देखने दर्पण का प्रयोग नही करती ऐसा हमे लगता है। उसे लगता है कि सामने कोई दूसरा पंछी है उसी की नस्ल का। यही कारण है कि शुरु शुरु मे पिंजरे के अन्दर दर्पण रखने पर उसने चोच से उसे मारना शुरु कर दिया। नाराज भी होती रही पर धीरे-धीरे उसे अन्दर वाला पंछी अच्छा लगने लगा। अब वह घंटो मंत्र-मुग्ध सी उसके सामने बैठी रहती है। खाना भी वही खाती है और सोती भी वही है। पहले कुछ घंटो के लिये उसे अकेला छोडने पर वह चिल्लाती थी पर अब इस नये साथी के साथ वह मजे से रह लेती है।

जैसा कि पहले बताया दर्पण के सामने सुन्दरी मंत्र-मुग्ध सी स्थिर खडी रहती है, न बोलती है न ही किसी और की सुध रहती है इसलिये दिन मे कुछ ही घंटे उसके सामने दर्पण रखा जाता है। सुन्दरी से प्रभावित बच्चे जब उसके लिये गिफ्ट लाने की बात कहते है तो मै उन्हे नये किस्म के दर्पण लाने की राय देता हूँ। सुन्दरी को खुश रखने के लिये घर के सदस्य तरह-तरह की सीटी बजाते है और आवाजे निकालते है। बहुत बार तो सुन्दरी कूद कर दर्पण के सामने आ जाती है इस आस मे कि शायद अन्दर वाला आवाज दे रहा है।

सुन्दरी के आने के बाद आस-पास तरह-तरह की मधुर आवाजे निकालने वाले पंछियो की संख्या बढ गयी है। वैसे हमारे बागीचे मे नाना प्रकार के पेड-पौधे लगे है और हम रसायनो का प्रयोग नही करते है इसलिये बडी संख्या मे चिडियो का बसेरा है। सुन्दरी की सुबह इन्ही आवाजो को सुनते होती है। मै रात भर जागता हूँ इसलिये रात के पंछियो से लेकर सुबह चार बजे आवाज करने वाले पंछियो को सुन पाता हूँ। इसके बाद सुन्दरी की ड्यूटी शुरु होती है। बहुत से तोते भी सुन्दरी की आवाज सुनकर आ जाते है। जंगल मे शिकारी पालतू पंछी की मदद से उनके साथियो को पकडते है।

कुछ वर्षो पहले मै रायगढ मे वानस्पतिक सर्वेक्षण कर रहा था। वहाँ लोगो ने डहूक नामक पंछी पिंजरे मे बन्द कर रखा था। वह सुन्दर नही था न ही उसकी आवाज मधुर थी। फिर क्यो इसे पाला है? मैने पूछ ही लिया। उन्होने राज खोला कि इसकी विचित्र आवाज सुनकर इसके साथी आ जाते है और आसानी से पकड लिये जाते है। वे इस पंछी को खाते है। रोज इस तरह इसकी मदद से पंछी पकडे जाते है और खाये जाते है। बडा आश्चर्य लगता है कि कैसे इसके साथी और सजातीय रोज ऐसी बेवकूफी कर बैठते है? कभी तो कोई होशियार पैदा होगा इनके बीच।

चलिये विषय से थोडा भटक ही गये है तो आपको हिरण से जुडा किस्सा भी बताते है। बहुत से वनाँचलो मे हिरण को बचपन से पाल लिया जाता है फिर उसे रोज गुड खिलाया जाता है। बडे होने पर वापस उसे वन मे छोड दिया जाता है। वन मे उसे गुड की याद आती है। वह वापस आता है पर अकेले नही दो-तीन को साथ ले के। ये दो-तीन आते तो है पर वापस नही जा पाते है। पालतू हिरण को गुड मिलता है और फिर उसे वन मे छोड दिया जाता है उसी प्रक्रिया को दोहराने। जब बहुत कम मनुष्य़ थे और बहुत ज्यादा वन्य प्राणी तब तो यह सब बिना किसी पर्यावरणीय असंतुलन के चलता रहता था पर अब मनुष्य़ के यही प्राचीन तरीके उसके लिये अभिशाप बनते जा रहे है। इन वन्य प्राणियो को बचाने की मुहिम मे जुटे लोगो के लिये ऐसी जानकारियाँ महत्वपूर्ण हो सकती है। जंगलो मे जाने से ऐसे राज अक्सर पता चल जाते है। पर इन्हे कहाँ और कैसे बताये यह समझ नही आता। चलिये अब इस लेख के माध्यम से यह सम्भव हुआ।

सुन्दरी के साथियो को चिंतित नही होना चाहिये क्योकि हम उन्हे नही पकडने वाले। इस आस मे कि शायद उसके साथी भी दर्पण से प्रेम करते हो मैने कुछ दर्पण बागीचे मे रखे पर अभी तक तो कुछ रोचक देखने को नही मिला। सुन्दरी के लिये एक खुशखबरी है। एक शीश महल अर्थात दर्पण ही दर्पण से भरे एक विशेष पिंजरे के निर्माण की बात चल रही है। देखिये यह कब सम्भव हो पाता है।

इस लेखमाला के अन्य लेखो को पढने के लिये इस लिंक को क्लिक करे।

[क्षमा करे ये पोस्ट दोबारा शामिल कर रहा हूँ। पहली पोस्ट मे सुधार करते-करते वह डिलिट हो गयी। उसमे दिनेश जी की एक टिप्पणी आयी थी वह भी विलोपित हो गयी। मै उसे डेशबोर्ड मे खोज रहा हूँ। आशा है दिनेश जी क्षमा करेंगे।

आप बताये कि डिलिट पोस्ट को क्या दोबारा प्राप्त किया जा सकता है? यदि हाँ तो कैसे?]

Thursday, April 3, 2008

एक सुन्दरी मेरे जीवन मे (भाग-4)

एक सुन्दरी मेरे जीवन मे (भाग-4)

- पंकज अवधिया

पिंजरे मे जंग न लगे इसलिये इसे प्लास्टिक कोटेड बनाया गया। जब सुन्दरी को इसमे रखा गया तो पहले तो कोई दिक्कत नही हुयी पर बाद मे पिंजरे को ध्यान से देखने के पर पाया कि यह कोटिंग जगह-जगह से उखडी हुयी है। माथा ठनका। रात को उठकर देखा तो पता चला कि सुन्दरी ही उसे कुतर रही है। हमे डर यह था कि कही यह प्लास्टिक अन्दर तो नही जा रहा है। पिताजी ने तुरंत पिंजरा बदलने की बात की। वे बहुत ज्यादा सशंकित थे। सुन्दरी के व्यव्हार और खान-पान मे कुछ फर्क नही दिख रहा था। कुतरा हुआ प्लास्टिक छोटे-छोटे टुकडो के रुप मे नीचे पडा दिखता था। हम लगातार नजर जमाये रहे। कुछ दिनो मे यह स्पष्ट हो गया कि चोच की कसमसाहट को दूर करने या उसे पैना करने के लिये सुन्दरी यह सब करती रही। जबलपुर मे मामा जी के घर करन तोता है। वो दिनभर घर मे खुला घूमता है। जब उसे छोडा जाता है तो सारे जूते-चप्पलो को छुपा दिया जाता है। नही तो कुछ भी कतरे जाने से नही बचता। उन्होने जब इस बारे मे बताया तो सुन्दरी की इस आदत को हमने और अच्छे से जान लिया।

सुन्दरी को मच्छरो से बचाने के लिये गाँव के दर्जी से एक छोटी सी मच्छरदानी सिलवायी गयी। रात को इसे लगाकर खिडकी की ओर कपडा ढक दिया जाता है ताकि उसकी जानी दुश्मन बिल्ली रानी खिडकी पर आकर बैठे भी तो सुन्दरी को डरावने सपने न आये। कुछ ही दिन बीते कि सुन्दरी ने मच्छरदानी और कपडे मे भी बडे-बडे छेद कर दिये। अब जब भी उसे नीन्द नही आती है, इन छेदो से झाँकती रहती है और बिल्ली रानी को चिढाती रहती है। सर्दियो मे कम्बल का भी उसने यही हश्र किया। सब उसे प्यार करते है पर इस हरकत पर नाराज भी हो जाते है। दो बार के प्रयास के बाद अब वही फटी मच्छरदानी उपयोग हो रही है।

आल आउट मे उपस्थित एलीथ्रीन मच्छरो और आदमियो को किस मात्रा मे नुकसान पहुँचाता है यह तो वैज्ञानिक दस्तावेज बतलाते है पर सुन्दरी की प्रजाति के तोतो के पास कितनी देर तक इसे जलाना चाहिये यह जानकारी कही नही मिलती। कम देर तक जलाओ तो मच्छर नही भागते और ज्यादा देर होने पर चिंता होती रहती है। शुरु-शुरु मे सुन्दरी को मच्छर खाते देखा तो लगा कि अब ये शैतान उसके लिये समस्या नही बनेगे पर लगता है कि उसे मच्छर स्वादिष्ट नही लगे। इस प्रजाति के तोते कीडे-मकोडे तो खाते ही है। सुन्दरी का पूरा शरीर ढका होने के कारण मच्छरो से बचा रहता है। पर पंजे खुले होते है। उसी पर मच्छरो की नजर रहती है। रात को सोते समय दूर ही से चट-चट की आवाज सुनायी देती है। एकांतर क्रम मे वो अपने पंजो को हिलाती रहती है चाहे मच्छर हो या न हो। यह प्रक्रिया नीन्द मे भी जारी रहती है। बडी दया आती है। पर करे भी तो क्या? अपनी जडी-बूटी जलाने से वह शोर मचाती है। शायद धुँआ ज्यादा कडवा लगता है उसे।

इस बार मच्छर कुछ ज्यादा ही है। जब भी कोई मच्छर सुन्दरी की ओर आता है तो वो जोर से घुडकने जैसी आवाज निकालती है। शायद यह प्रभावी है क्योकि हमने इससे अक्सर मच्छरो को दूर जाते देखा है।

Wednesday, April 2, 2008

कैरी के मॉर्निंग वाक् के साथी

पिछली पोस्ट मे हमने कैरी का परिचय और कैरी की ट्रेनिंग का जिक्र किया था तो आज कैरी के कुछ morning walk के साथियों से आप लोगों को मिलवाते है।अब यहां गोवा मे तो हर घर मे ही एक-दो doggi रहते है। कैरी की walk की ट्रेनिंग के बाद हम ने और पतिदेव ने उसे लेकर walk के लिए निकलना शुरू किया। पहले हम लोग शाम को बस थोडी दूर ही जाते थे पर फ़िर धीरे-धीरे कैरी को भी walk मे मजा आने लगा था तो हम लोगों ने morning walk के लिए जाना शुरू किया।अब तो walk कहते ही कैरी दौड़ कर बाहर जाकर खड़े हो जाते है। तो चलिए कुछ कैरी के दोस्तों से मिलवाते है।

पहले सड़क के और जिस घर के सामने से निकलते थे वहीं से जोर-जोर से भौकने की आवाजें आने लगती थी। और अब तो ये आलम है की कैरी हर घर हर गली जहाँ उनके ये साथी रहते है वहां रुक कर अपने दोस्तों को हेलो करना नही भूलते है।क्या कहा यकीन नही आ रहा है। अरे ये देखिये कैरी गेट के सामने खड़े है और उनका साथी उन्हें सुबह-सुबह सारी ख़बर दे रहा है।


और वहां से आगे चलने पर ये मिलते है । ये बहुत ही ज्यादा शोर करता है। और पूरी सड़क पर अपना राज समझते है।



दाहिनी ओर वाली फोटो मे तीन doverman दिख रहे है। इनकी खासियत ये है की ये तीनो एक-दूसरे को सपोर्ट करते हुए भौंकते है। पहले इस जगह से और फ़िर गेट पर आकर भी भौंकते है। पर पिछले डेढ़ साल से कैरी को देखते है इसलिए अब सिर्फ़ फोर्मलिटी ही करते है भौंकने की।और बस हालचाल पूछ लेते है।


और ये कुछ मिक्स breed है boxer की । ये बहुत ही खूंखार टाइप है। इसका ये हाल है की ये घर वालों के कंट्रोल मे भी नही रहता है।





और ये छोटे-छोटे उस कहावत को दर्शाते है की सूप तो सूप चलनियों बोल। और मजा ये की जब कैरी चलते रहते थे तो ये भौंकते थे पर जैसे ही कैरी रुक कर मुड़ते की ये सारे के सारे भाग कर दूर चले जाते थे।







अब इस फोटो मे जो तीन दिख रहे है मॉर्निंग वाक के अंत मे इन्ही से कैरी की हेलो होती है। ये तीनो कैरी को देखते ही भौंकना शुरू कर देते है और हमारे कैरी महाशय बैठकर उन्हें देखते-सुनते है ।



और अब तो आलम ये है की कैरी सुबह-सुबह गाना गाकर हम लोगों को उठा देते है है walk के लिएमजाल है की कोई सुबह सोता रह जाएअब तो एक रूटीन बन गया है हफ्ते के पाँच दिन तो हम लोग कैरी को अपने मोहल्ले मे ही walk कराते है पर शनिवार और रविवार को कैरी beach पर walk के लिए जाते हैजहाँ कैरी को बहुत मजा आता है

Tuesday, April 1, 2008

मेरे घर आये मिट्ठू मियां

ये वाकया आज से लगभग ५ साल पहले का है.मई के महीने की अलस भरी सुबह थी.बिटिया को स्कूल बस पर चढा के आई, आकर एक प्याला चाय का बनाया और अखबार लेकर बिस्तर पर ही फ़ैल कर बैठ गई.मेरी लाडली वैली (१.५ वर्षीय लैब्राडोर) भी वहीं पडी सुस्ता रही थी.ना जाने कब मेरी आंख लग गई और मुझे अचानक से सपने में शिर्डी के सांई बाबा दिखे. तन्द्रावस्था में ही याद आया कि आज तो गुरुवार है,बाबा की सेवा करनी है.इतने में ही बाबा तो अन्तर्धान हो गये और एक हरियल तोता उडता हुआ मेरे सामने आकर बैठ गया.इसके बाद मेरी नींद टूट गई.उठते ही निश्चय किया कि मेरे पास जो खाली पिन्जरा रखा है, उसके लिये १-२ दिनों में ही एक मिट्ठू ले आऊंगी.इस के उपरांत मै घर के दैनंदिन कार्यों में व्यस्त हो गई.दोपहर के १२-१ बजे वैली ने भौंकना शुरु किया, और मेरी काम वाली चिल्लाई, "दीदी ये देखो बालकनी में तोता आया है." मै सुबह का देखा हुआ स्वप्न लगभग भूल ही गई थी, अत: बोली,"अरे उसे उडा दो ".थोडी देर में वैली का भौंकना बढ गया ,काम वाली की आवाज में और तीखापन आ गया तो मै भी बालकनी की ओर चली.देखा तो तोता महाशय साथ लगे हुए कमरे में प्रवेश कर चुके हैं और स्टील की अलमारी पर विराजे हुए हैं.मेरे भगाने की कोशिश को दरकिनार करते हुए मिट्ठू साहब ड्राइन्ग रूम की ओर उड चले और वहां लटकी एक तस्वीर पर खुद भी चिपक गये.अब कैसे ,क्या हो ?
बडी ही विषम परिस्थिति बन गई थी.वैली की उग्रता चरम पर थी, वो लगातार भौंक कर और यहां से वहां कूद कूद कर आफ़त कर रही थी.तोते महाशय को कोई घबराहट नहीं थी.अचानक बोले,"मिट्ठू को खाना दो,सुनो,सुनो." मै अचरज में पड गई, न जाने किस के घर से छूट कर आया है, इसके घर-वाले कितने परेशान हो रहे होंगे? लेकिन अतिथी महोदय का सत्कार तो ज़रूरी था ना? इसलिये पहले वैली को बांधा,फ़िर रसोई से गुड निकाल कर लाई. जैसे ही मैने अपनी हथेली आगे की, श्रीमानजी बिना किसी तकल्लुफ़ के गुड कुतरने लगे.फ़िर बिस्किट की बारी आयी.ऊपर से पिन्जरा निकाल कर मिट्ठूजी का ग्रह प्रवेश करवाया. वो बडी शान से पिन्जरे में दाखिल हो कर चहल-कदमी करने लगे.अपनी सोसाइटी में रहने वाले घरों में पुछवाया किन्तु मिट्ठूजी के मालिक का कोई पता नहीं चल पाया. जिस दौरान मिट्ठूजी हमारे यहां आतिथ्य ग्रहण कर रहे थे,मुझे यकायक सुबह का सपना याद आ गया.शिर्डी के सांई बाबा का आशीर्वाद समझ कर मिट्ठूजी को हमारे घर के सदस्य के रूप में मान्यता मिल गई. अगली पोस्ट में मिट्ठूजी की खास अदाओं से आपका परिचय करवाऊंगी.

Monday, March 31, 2008

एक सुन्दरी मेरे जीवन मे (भाग-तीन)

एक सुन्दरी मेरे जीवन मे (भाग-तीन)

- पंकज अवधिया

उपचार के बाद जब सुन्दरी को वापस छोडने की बारी आयी तो हम असमंजस मे पड गये क्योकि हमे नही मालूम था कि वह किन परिस्थितियो मे छत पर गिरी थी। आमतौर पर ये पक्षी झुण्ड मे रहते है और एक बार बिछड जाने के बाद दूसरे झुंड इन्हे नही स्वीकारते है। अंत मे यह निश्चय किया गया कि सुन्दरी को अपने पास ही रखा जाये। हमारे पास एक बडा सा पिंजरा था जिसे पिताजी ने बचपन मे बनवाया था। उस समय हम लोगो ने चुनमुन चिडिया पाली थी। ये चिडिया रात को एक कोने मे सिमट कर बैठ जाती है। एक दिन पिंजरा बाहर छूट गया और बिल्ली ने सब को खा लिया। उसके बाद कभी भी चिडिया न पालने का मन बना लिया था हम लोगो ने। पर सुन्दरी के आगमन ने मन मे उत्साह भर दिया।

यह बडा पिंजरा सुन्दरी को भी खूब भाया। पर इसे सम्भालना मुश्किल था। रोज इसे साफ करना बला लगा। फिर इतने बडे पिंजरे मे सुन्दरी को ठीक से पास से देख भी नही पाते थे। इसलिये इसे थोडे छोटे पिंजरे मे रखने की कोशिश की। पर जब भी ऐसा किया गया सुन्दरी ने विद्रोह कर दिया। सब कुछ छोड के वह पिंजरे को काटने मे जुटी रहती। पास बुलाने पर गुर्राती। जब वापस बडे पिंजरे मे ले जाते तो सामान्य हो जाती। आखिर उसकी ही जीत हुयी।

आपने तो देखा ही होगा तोते को लोग कैसे छोटे से पिंजरे मे रखते है। इतने छोटे कि वह ठीक से घूम भी न सके। फिर उसके पंख भी कतर दिये जाते है। हमने यह निश्चित किया कि कभी पंख नही काटेंगे। आज तक उस निश्चय पर कायम है। कभी-कभी लगता है कि पंख काटने पर उसे हम डायनिंग टेबल पर घुमा सकेंगे। उससे और घनिष्ठ हो सकेंगे पर दूसरे ही पल यह सोच कर दुखी हो जाते है कि कही पंख कतरने से यह नन्हा सा पंछी नाराज न हो जाये। पिंजरे मे सुन्दरी मजे से उडती है। जब वह उडती है तो हम वाह,वाह, हेलीकाप्टर कहते है। शांत बैठी सुन्दरी अब तो हेलीकाप्टर शब्द मुँह से निकलते ही एक जगह पर उडने लगती है। काफी प्रफुल्लित होकर। पता नही वह इस शब्द का क्या मायने निकालती है। भविष्य़ मे उससे संवाद कायम हुआ तो उसे बतायेंगे कि हेलीकाप्टर क्या है? दिखायेंगे भी।

मिलिये हमारी सिन्ड्रेला से

आइए हम आपको मिलवाते है अपनी सिंड्रेला से, ये लेख कुछ साल पुराना है, लेकिन इस ब्लॉग के एकदम उपयुक्त दिखा, इसलिए दोबारा पब्लिश कर रहे है। क्योंकि पुरानी पोस्ट को कई नए चिट्ठाकारों ने नही पढा होगा।



Cyndrella



अब जब अतुल भाई ने कुत्तों का जिक्र छेड़ा है तो हम भी अपनी सिन्ड्रेला से आपको मिलवा दें. हमारी सिन्ड्रेला बहुत सुन्दर है और हमारे घर की सदस्य की तरह है. सिन्ड्रेला आजकल आई आई टी रूड़की मे है, नही भई कोई शोध वगैरहा नही कर रही...बल्कि हमारी साली साहिबा के घर पर पर विराजमान है.

श्वानो से मेरा प्रेम बहुत पुराना रहा है, हमारी पहली पैट थी जिनी, जो अब इस दुनिया मे नही रही, जिनी से हमारा प्यार इस हद तक था कि हम उसे अपने बच्चे की तरह प्यार करते थे, और हम पति पत्नी ने अपने अपने नाम का पहला अक्षर मिलाकर उसका नाम रखा था, यानि कि जितेन्द्र और नीरू( मेरी पत्नी रितु का शादी के पहले का नाम) यानि कि जिनी.

अब सिन्डी उर्फ सिन्ड्रेला की कहानी भी सुन लीजिये, ये है 95% पूडल और 5% पामेरियन प्रजाति की. बहुत नखरे वाली है, बहुत ज्यादा मूडी है, टाम मूडी से भी ज्यादा ,नहाने के नाम पर तो इनको सांप सूंघ जाता है, इनको जैसे ही पता चलता है कि नहाने का समय हो गया है, फिर तो ये ऐसे गायब होती है, जैसे गधे के सर से सींग. इनको लाँन मे टहलना पसन्द है और चोरी चोरी छिप छिप कर किचेन गार्डन से भिन्डियाँ तोड़कर खाना ज्यादा पसन्द है. अब लाँन मे टहलने की वजह से इनके चेहरे की ये हालत होती है तो इनकी हड़काई होनी लाजिम है.

Cyndrella



इनको डर लगता है तो सिर्फ साँप से, बाकियों को ये दौड़ा मारती है. हाँ खाना खाते वक्त यदि आपने अपने हाथ से नही खिलाया तो ये नाराज भी हो जाती है, फिर मनाते रहिये, घन्टों........बच्चों से इनको विशेष प्रेम है, इसी प्रेम के चलते एक बार अपनी टाँगे तुड़वा चुकी है, बच्चों ने इनको एक ऊँची टेबिल से जम्प करवा दिया था, और प्रेम के चलते ये ना नही कर सकी....खैर अब ये कुछ ज्यादा समझदार हो गयी है, शरारती बच्चों से दूर ही रहती है.

अगले कुछ लेखों मे बात करेंगे मेरे श्वानो के प्रेम की, और मेरी पहली श्वान जिनी की, जिसकी याद आते ही आज भी मेरी आँखों मे आंसू आ जाते है।

Saturday, March 29, 2008

कैरी की ट्रेनिंग

कैरी के घर मे आने के बाद सबसे पहले तो डॉक्टर की खोज शुरू हुई क्यूंकि फातिमा फर्नांडिस ने उस समय तक कैरी को कोई भी वैक्सीन नही लगवाया थाअब इस अनजानी जगह मे किस्से पूछते सो फातिमा को ही फ़ोन किया और उनसे डॉक्टर का फ़ोन नम्बर लिया और उसे घर पर ही आने के लिए कहा क्यूंकि कैरी को हॉस्पिटल ले जाने मे डर लगता था की पता नही वहां रुकेगा भी या नही

कैरी की सबसे पहली ट्रेनिंग खाने की शुरू की गई जिससे उसे समय पर खाना खाने की आदत रहेखाने के लिए फातिमा ने बताया था की इसे दूध, सेरेलक ,खिचड़ी मीट,वगैरा देती थी सो हमने भी वही सब देना शुरू कियाधीरे-धीरे खाने मे बदलाव आता गया अंडा,चिकेन ,रोटी ,सब्जी ,दही वगैरा भी देना शुरू कियाहम कैरी को सिर्फ़ मांसाहारी खाने पर नही रखना चाहते थेक्यूंकि हमने सुना है की सिर्फ़ मांसहारी खाना खाने से doggi ज्यादा वोइलेंट होते है

और फ़िर शुरू हुई ट्रेनिंग बिस्तर पर और ड्राइंग रूम मे सोफे पर ना चढ़ने की क्यूंकि हमे कैरी से प्यार तो था पर उसका बिस्तर पर चढ़ना गवारा नही थाहाँ बेटों के रूम और बिस्तर पर कैरी अपना पूरा अधिकार समझता हैपर कैरी ना तो हमारे कमरे मे आता था और ना ही बिस्तर पर चढ़ता थाबस हमारे कमरे के दरवाजे पर ही बैठ जाता था

और अब आई असली ट्रेनिंग की बारी यानी walk करने कीशुरू मे घर मे walk कराया गया तो लीश पर चलता ही नही थाजहाँ लीश बांधते की वो उछलने लगता थाखैर रोज शाम को आधे घंटे का ट्रेनिंग कार्यक्रम चलता रहा और थोड़े दिन उसने ठीक से walk करना सीख लिया। कैरी ने जब ठीक से लीश पर चलना शुरू किया तो घर के पास थोड़ा थोड़ा walk के लिए बाहर निकलना शुरू कियाऔर फ़िर रोज शाम को walk के लिए घर से बाहर निकलना शुरू कियापहले तो हमने कह दिया था की हम कैरी को टहलाने नही जाया करेंगे पर बाद मे हम और पतिदेव ही कैरी को walk के लिए ले जाने लगेइसे लेकर जब हम लोग बाहर निकलते थे तो ऐसा लगता था मानो सारे शहर के doggi इसके पीछे पड़ गए होऔर कैरी बेचारा डर के मारे वापिस घर की ओर भागने लगता थाऔर कैरी से ज्यादा हमे डर लगता की अगर कहीं सब doggi ने अटैक कर दिया तो हम किसको बचायेंगेपर जल्द ही ये डर ख़त्म हो गया क्यूंकि जब रोज-रोज walk के लिए जाने लगे तो सब कैरी को पहचानने लगे थे

Wednesday, March 26, 2008

एक सुन्दरी मेरे जीवन मे (भाग-दो)

एक सुन्दरी मेरे जीवन मे (भाग-दो)

- पंकज अवधिया

आमतौर पर करण तोते पाले जाते है। वे बडे होते है और पीढियो से उन्हे पाला जा रहा है इसलिये उनकी भोजन सम्बन्धी आवश्यकत्ता की जानकारी आसानी से मिल जाती है पर सुन्दरी के मामले मे बडी दिक्कत का सामना करना पडा। सुन्दरी को क्या खिलाया जाये इसकी खोज मे इंटरनेट खंगाल डाला पर ज्यादा जानकारी नही मिली। पहले तो सेव और संतरे खिलाये गये। सेव का गूदा न खाकर उसने बीज मे रुचि दिखायी। संतरा उसे अधिक पसन्द नही आया। मिर्च आमतौर पर तोते पसंन्द करते है। मिर्च सुंन्दरी की भी पहली पसंद है। पर बीज अधिक होने चाहिये। दाल-चावल सुन्दरी को अधिक पसन्द नही आता है। बचपन मे चने की दाल को भिगोकर फिर पीसकर उसे खिलाया गया। यह पीसी दाल उसे बहुत पसन्द आती थी। दाल पीसने की आवाज होते ही वह चहकने लगती थी।

भोजन की समस्या उस समय हल हुयी जब गाँव से कुछ लोग आये। सुन्दरी को देखते ही बोले कि ये तो शैतान तोता है। हमारी फसल बर्बाद कर देता है। मक्के मे दाने पडे नही कि इनका आक्रमण शुरु हो जाता है। रात को भी ये फसल पर आक्रमण करते है। हमने उनकी बाकी बाते अनसुनी की और मक्के के नये दूध भरे दाने सुन्दरी को दिये। उसने बडे चाव से इसे खाया। फिर पता चला कि पीपल और बरगद के फलो को फैलाने मे भी इनकी भूमिका है। दोनो ही फल गाँव मे मिल जाते है। तुअर की फली और दाने भी इसे पसन्द आये। दाल-चावल की जगह दूध-चावल दिया गया। फिर अंजीर भी सूची मे शामिल हो गयी। सुन्दरी बहुत कम खाती है और उसे जल्दी-जल्दी भूख लगती है। अकेली है इसलिये नाज-नखरो से पली है। एक बार खाने के बाद जब तक बर्तन न बदलो किसी भी चीज को नही खाती है। हम तो सोचते थे कि मनुष्यो के ही नखरे होते है पर सुन्दरी ने भ्रम दूर कर दिया।

लोगो ने सलाह दी कि तोते को मीठा खिलाने से बाल झड जाते है। पहले तो हम डरे पर बाद मे उसे मिठाईयाँ मिलने लगी। आज ही मै उसके बाल देख रहा था। गर्मी बढ रही है। हम चाहते है कि बाल झडे ताकि उसे कम गर्मी लगे पर बाल साल भर वैसे ही रहते है। ये बाल भले गर्मी के लिहाज से ठीक न हो पर सुन्दरी को मच्छरो से बचाते है। शक्कर सुन्दरी की पसन्दीदा चीजो मे से एक है। किसी भी भोज्य पदार्थ मे ऊपर से शक्कर डालकर उसे दिया जा सकता है। नमक की भी शौकीन है पर नमक कम ही दिया जाता है उसे।

इंटरनेट पर इस प्रजाति के तोतो के विषय मे कम जानकारी को देखते हुये मैने हिम्मत करके एक शोध आलेख लिखा सुन्दरी को नजर मे रखकर और चित्रो के साथ उसे प्रकाशित किया। इसके बाद मुझे इस प्रजाति का विशेषज्ञ माना जाने लगा। इस प्रतिक्रिया ने मुझे प्रेरित किया कि मै जंगलो मे भ्रमण के दौरान इस प्रजाति के तोतो पर नजर रखूँ। कुछ ही समय मे नयी जानकारियाँ मिलने लगी और वैज्ञानिक दस्तावेज तैयार होने लगे। इन जानकारियो से सुन्दरी के पालन-पोषण मे बहुत मदद मिली।

Wednesday, March 19, 2008

कैरी का परिचय




कैरी यानी हमारा प्यारा सा boxer जो अब दो साल का होने जा रहा है। आज आपको हम उसके परिवार के बारे मे बताने जा रहे है।कैरी जिसे गोवा आने के एक महीने बाद हमने यहां की एक लोकल महिला फातिमा फर्नांडिस से लिया था।फातिमा जो कि एक बहुत बूढी पतली-दुबली महिला है। और अकेले अपने एक गोद लिए हुए बच्चे और तीन बड़े-बड़े boxer के साथ रहती है।

और जब हम कैरी को देखने गए थे तब इसके माता-पिता को देख कर हम तो डर कर भाग ही खड़े हुए थे । उफ़ कितने भयानक और खौफनाक लग रहे थे सब।इतने जोर-जोर से भौंक रहे थे कि कान फट जाए।हमारे बेटे बोले कि आप डरिये मत बस उनको घूर कर देखिये तो वो चुप हो जायेंगे। पर हमे तो ऐसा लग रहा था कि अगर उन्हें मौका मिला तो बिल्कुल चीर-फाड़ कर खा जायेंगे।पर एक अच्छी बात थी कि जैसे ही फातिमा ने उन्हें अन्दर जाने को कहा सारे चुपचाप घर के अन्दर चले गए। और ये है वो तीनों बड़े boxer ।

खैर तीन महीने के कैरी को लेकर हम लोग घर आए तो सवाल ये नही था की कि कैरी रहेगा कहाँ और किसके कमरे मे।क्यूंकि हमारे बेटे तो उसे अपने कमरे मे उसे रखने के तैयार ही बैठे थे। बस हमने ये शर्त रक्खी कि कैरी हमारे कमरे मे नही आएगा। कैरी आ तो गए पर उसके बाद हमे बाजार भी जाना पड़ा बस ये ना पूछिये क्यों ,अरे भाई के खाने -पीने के लिए बर्तन वगैरा जो लाना था। और कैरी को ट्रेन करने की जिम्मेदारी भी हमने अपने बेटों को दी क्यूंकि हमे घर मे गंदगी हो ये बर्दाश्त नही था।और फ़िर शुरू हुई कैरी की ट्रेनिंग ।

एक और नए ब्लॉग की शुरुआत

आज हम एक और नए group ब्लॉग की शुरुआत कर रहे है hamare pets (http ://hamare pets.blogspot.com) इस ब्लॉग के लिए हमे आप सभी का साथ चाहिए। इस ब्लॉग मे हम सभी अपने pets के बारे मे लिख सकते है।क्यूंकि जब हम कोई pet पालते है तो चाहे अप भी,बिल्ली हो, खरगोश हो,चिडिया या तोता हो और चाहे doggi हो , उससे एक अलग सा लगाव हो जाता है।अगर आप भी इससे जुड़ना चाहते है तो बस हमे एक -मेल कर दीजियेगा

एक सुन्दरी मेरे जीवन मे (परिचय)

एक सुन्दरी मेरे जीवन मे (परिचय)

- पंकज अवधिया

एक दिन घर की छत पर हमे कुछ तोते घायल अवस्था मे मिले। उनका उपचार आरम्भ किया तो दो ही बच पाये। बाद मे एक और तोते को हम नही बचा पाये। अब जो बचा वह मेल है कि फीमेल, इसे लेकर असमंजस मे रहे। जानकार लोगो ने बताया कि यदि इसके सिर का रंग बडे होने पर लाल हुआ तो मेल होगा। पर यह तोता इतना प्यार था कि इसका नाम सुन्दरी रख दिया गया। जब सुन्दरी बडी हुयी तो पता चला कि यह तो मेल है। सबने सोचा अब इसे सुन्दरलाल पुकारा जाये पर इससे सुन्दरी दुखी रहने लगी। इसलिये सब कुछ जानते हुये भी हम सब उसे सुन्दरी कहते है। इस लिंक मे जाकर आप सुन्दरी की तस्वीरे देखिये। मेरी लेखमाला इसी के आस-पास घूमेगी।

http://ecoport.org/ep?SearchType=pdb&PdbID=103267

http://ecoport.org/ep?SearchType=pdb&PdbID=103265

http://ecoport.org/ep?SearchType=pdb&Subject=Psittacula+cyanocephala&Author=oudhia&SubjectWild=CO&Thumbnails=Only&CaptionWild=CO&AuthorWild=CO